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माननीय सभापतिः मैं अब संशोधन पर मत लूँगा।
¹संशोधन अस्वीकृत हुआ।ह्
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अनुच्छेद 103
* माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः (बम्बई - जनरल)ः सभापति महोदय, मैं प्रस्ताव करता हूँः
फ्कि अनुच्छेद 103 के खण्ड (1) में फ्और कम से कम सात अन्य न्यायाधीशों से जैसा संसद विधि द्वारा विहित करेय् के स्थान पर फ्जब तक संसद विधि द्वारा अधिक संख्या विहित नहीं करती है, तब तक सात से अनाधिक अन्य न्यायाधीशों से मिलकर बनेगा।य्
इस संशोधन का उद्देश्य यह है कि जब तक संसद कानून के द्वारा न्यायाधीशों की संख्या निर्धारित नहीं करती तब तक उच्चतम न्यायालय का गठन नहीं किया जाना चाहिए। संशोधन में यह निर्धारित किया गया है कि सात न्यायाधीशों से उच्चतम न्यायालय का गठन होगा।
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# माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः महोदय मैं प्रस्ताव करता हूँः
फ्खण्ड (3) के स्पष्टीकरण में ‘न्यायिक पद’ शब्दों के बाद ‘जो जिला न्यायाधीश के पद से अवर नहीं है’ शब्द अन्तःस्थापित किए जाएं।य्
मैं यह भी प्रस्ताव करता हूँः
फ्कि अनुच्छेद 103 के खण्ड (4) में फ्कम से कम दो तिहाई बहुमत सेय् संसद के दोनों सदनों के उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों द्वारा राष्ट्रपति के समक्ष रखे जाने पर शब्दों के स्थान पर संसद के प्रत्येक सदन द्वारा अपनी कुल सदस्य संख्या के बहुमत द्वारा तथा मत देने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत द्वारा समर्थित समावेदन राष्ट्रपति के समक्ष रखे जाने पर, शब्द प्रतिस्थापित किए जाएं।
माननीय सभापतिः डॉ. बख्शी टेकचन्द द्वारा इस संशोधन में एक संशोधन प्रस्तुत किया गया है, जिसके बारे में उन्होंने नोटिस दिया है। संशोधनों के संशोधन में अन्तर्विष्ट मुद्रित पैम्फलेट में संख्या 101 दी गई है।
संशोधन प्रस्तुत नहीं किया गया।
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* ख्., सीएडी, खण्ड VIII, दिनांक 23 मई, 1949, पृ. 230
# ख्., सीएडी, खण्ड VIII, दिनांक 23 मई, 1949, पृ. 242-43