अनुच्छेद 103 - Page 61

42 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

* माननीय संभापतिः संशोधन संख्या 1857 एक शाब्दिक संशोधन है। संशोधन संख्या 1858 प्रो. के.टी. शाह के नाम से है। क्या वह संशोधन ‘अक्षमता और दुर्व्यवहार’ शब्दों के द्वारा कवर नहीं होता?

प्रो. के.टी. शाहः यदि आपके विचार में ऐसा है, तो मैं इसे स्वीकार कर लूंगा। मैं इसे प्रस्तुत नहीं करता।

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माननीय सभापतिः ...........संशोधन संख्या 1862 डॉ. बी.आर. अम्बेडकर के नाम से है। वह भी एक औपचारिक संशोधन है जिसका उद्देश्य ‘घोषणा’ शब्दों के स्थान पर ‘प्रतिज्ञान या शपथ’ शब्दों से प्रतिस्थापित किया जाना है। प्रारूप संविधान के अन्य भागों में जहां भी ये शब्द आए हैं, वहां हमने इसी प्रकार के परिवर्तन किए हैं। मैं यह मान लेता हूँ कि इसे प्रस्तुत कर दिया गया है।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः महादेय, मैं औपचारिक रूप से प्रस्ताव करता हूँः

फ्कि अनुच्छेद 103 के खण्ड (6) ‘घोषणा’ शब्दों के स्थान पर ‘प्रतिज्ञान या शपथ’ शब्द प्रतिस्थापित किया जाए।य्

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# माननीय सभापतिः डॉ. अम्बेडकर क्या आप संशोधनों के बारे में कुछ कहना चाहते हैं?

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः सभापति महोदय मैं दो संशोधनों को स्वीकार करने के लिए तैयार हूँ। उनमें से एक तो श्री संथानम द्वारा प्रस्तुत संशोधन संख्या 1829 है और दूसरा श्री कामत द्वारा प्रस्तुत संशोधन संख्या 1845 है। इनके माध्यम से उन्होंने यह प्रस्ताव किया है कि जूरियों को भी सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया जा सकता है। लेकिन, श्री कामत के संशोधन संख्या 1845 के संबंध में मैं एक आपत्ति दर्ज कराना चाहूँगा और वह आपत्ति यह है कि मैं अभी तक अपने दिमाग में इस बात को तय नहीं कर पाया हूँ कि फ्विशिष्टय् शब्द इस संदर्भ में समुचित बैठता है। मुझे यह सुझाव दिया गया है कि फ्प्रख्यातय् शब्द कहीं अधिक समुचित होगा। लेकिन, जैसा कि मैंने कहा कि मैं इस विषय पर अपने मन को स्थिर नहीं कर पाया हूँ और इसलिए मैं इस आपत्ति को प्रारूप समिति को प्रेषित करने के पक्ष में हूँ कि प्रारूप * ख्., वही, 244

# सीएडी, खण्ड VIII, दिनांक 23 मई, 1949, पृ. 2