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समिति जब संविधान को संशोधित तरीके से तैयार करे तो उस समय उसे जो सही लगे उसे रखने की उसे स्वतंत्रता है कि वह फ्विशिष्टय् शब्द को स्वीकार करे अथवा उसके स्थान पर फ्प्रख्यातय् शब्द का प्रयोग करे अथवा कोई और समुचित शब्द डाले।
अब, महोदय, इस अनुच्छेद के बारे में प्रस्तुत किए गए बहुत सारे संशोधनों के संबंध में मुझे यह कहना है कि इनके माध्यम से वास्तव में तीन मुद्दे उठाए गए हैं। पहला तो यह कि उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति किस प्रकार की जानी है? अब इस मामले विशेष से संबंधित विभिन्न संशोधनों को एक समूह में डालने पर मैं तीन अलग-अलग प्रकार का प्रस्ताव पाता हूँ। पहला प्रस्ताव तो यह है कि उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति मुख्य न्यायाधीश की सहमति से की जानी चाहिए। एक विचार तो यह है। दूसरा विचार यह है कि राष्ट्रपति द्वारा की गई नियुक्तियों को संसद द्वारा दो तिहाई मतों से पुष्टि किए जाने का विषयाधीन बनाया जाना चाहिए और तीसरा सुझाव यह है कि उनकी नियुक्ति राज्यों की परिषद् के परामर्श से की जानी चाहिए।
इस मामले के संबंध में मैं पूरी तरह से सहमत हूँ कि जो मुद्दे उठाए गए हैं, वे सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं। सभा में इस बारे में कोई मतभेद नहीं हो सकता कि हमारी न्यायपालिका को कार्यपालिका से पूरी तरह स्वतंत्र तथा स्वयं में सक्षम होना चाहिए। और प्रश्न यह है कि इन दोनों उद्देश्यों की प्राप्ति किस प्रकार से हो सकती है। अन्य देशों में इस मामले को दो विभिन्न तरीकों से शासित किया जाता है। ग्रेट-ब्रिटेन में इनकी नियुक्ति राजा द्वारा की जाती है जिसमें किसी प्रकार की कोई सीमा नहीं लगाई गई है अर्थात् उसमें कार्यपालिका का कुछ भी लेना-देना नहीं होता। संयुक्त राज्य अमरीका में इसके विपरीत प्रणाली है। जहां उदाहरण के लिए उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के पदों के साथ-साथ राज्य के अन्य पदों पर नियुक्ति संयुक्त राज्य अमरीका के सीनेट की सहमति से ही की जाएगी। मुझे इन परिस्थितियों में जिनमें हम आज रह रहे हैं, उनमें मुझे यह लगता है कि जिम्मेदारी का अहसास उस हद तक नहीं हो पाया है जितना कि हम संयुक्त राज्य अमरीका के मामले में देखते हैं। इन नियुक्तियों के मामले को राष्ट्रपति पर बिना किसी आपत्ति या सीमा के पूरी तरह से छोड़ दिया जाना बहुत ही खतरनाक होगा अर्थात् उनकी नियुक्ति केवल विद्यमान कार्यपालिका के परामर्श पर किया जाना एक खतरनाक स्थिति होगी। उसी प्रकार से, मुझे ऐसा लगता है कि कार्यपालिका द्वारा की जाने वाली प्रत्येक नियुक्ति को विधानमंडल की सहमति का विषयाधीन बनाया जाना भी बहुत समुचित प्रावधान नहीं है। यह एक अति दुरूह प्रक्रिया होने के साथ-साथ इस प्रकार की नियुक्ति में राजनीतिक दबाव और राजनीतिक विचारों से प्रभावित होने की संभावना भी है। इसलिए, प्रारूप अनुच्छेद में मध्य मार्ग को अपनाए जाने की बात कही गई है। इसके अंतर्गत राष्ट्रपति को नियुक्तियों के मामले में सर्वोच्च और सम्पूर्ण