44 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
प्राधिकार नहीं प्रदान किया गया है। इसके अंतर्गत विधानमंडल को भी प्रभावी बनाने की कोशिश नहीं की गई है। अनुच्छेद में यह उपबंध किया गया है कि जो लोग इस प्रकार के मामले में समुचित सलाह देने के लिए पूरी तरह से योग्य हैं, ऐसे व्यक्तियों से परामर्श लिया जाना चाहिए। और मरे विचार से इस प्रकार के उपबंध को वर्तमान में पर्याप्त माना जाना चाहिए।
मुख्य न्यायाधीश की सहमति के प्रश्न के संबंध में मुझे ऐसा लगता है कि जो लोग उस सिद्धांत का समर्थन कर रहे हैं। वे लोग मुख्य न्यायाधीश की निष्पक्षता और उनके निर्णय की न्यायसंगतता के संबंध में उनके निहितार्थ पर विश्वास करते हैं। मेरा व्यक्तिगत तौर पर यह मानना है कि इसमें कोई संदेह नहीं कि मुख्य न्यायाधीश एक प्रख्यात व्यक्ति होता है। लेकिन, आखिरकार, मुख्य न्यायाधीश भी एक मनुष्य है जिसके साथ भी सभ्ी प्रकार की विफलताएँ, भावनाएं और पूर्वाग्रह जुड़े होते हैं जैसा कि हम आम लोगों के साथ होता है और मेरे विचार से न्यायाधीशों की नियुक्ति में व्यावहारिक तौर पर मुख्य न्यायाधीश को वीटो का अधिकार देना वस्तुतः उसमें प्राधिकार का स्थानांतरण किया जाना होगा जोकि हम राष्ट्रपति या सरकार में निहित करने को तैयार नहीं हैं। इसलिए, मैं उसे भी एक खतरनाक विचार मानता हूँ।
इस अनुच्छेद के संबंध में जो अलग-अलग संशोधन प्रस्तुत किए गए हैं उसमें जो दूसरा मुद्दा उठाया गया है वह आयु के प्रश्न से संबंधित है। आयु के संबंध में विभिन्न विचार व्यक्त किए गए हैं। कुछ लोगों का यह विचार है कि न्यायाधीशों को साठ वर्ष की आयु में सेवानिवृत्त हो जाना चाहिए। ठीक है, उच्च न्यायालयों के मामले में वर्तमान में यही स्थिति है। कुछ लोगों का यह कहना है कि संविधान में कोई भी आयु-सीमा निर्धारित नहीं की जानी चाहिए लेकिन, आयु-सीमा निर्धारित करने की शक्ति कानून द्वारा संसद पर छोड़ दी जानी चाहिए। मुझे लगता है इस विचार को स्वीकार नहीं किया जा सकता क्योंकि यदि आयु का मामला समय-समय पर निर्धारित करने हेतु इसे संसद पर छोड़ा जाता है, तो किसी भी व्यक्ति की न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति नहीं की जा सकती क्योंकि कोई भी व्यक्ति किसी भी पद को स्वीकार करते समय यह जानना चाहेगा कि स्वाभाविक दृष्टि से वह उस पर कितने वर्षों तक कार्य करेग और इसलिए यदि उसकी आयु के संबंध में जो प्रावधान किया गया है उसे समय-समय पर संसद द्वारा निर्धारित किए जाने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता है बल्कि उसे संविधान में ही निर्धारित किया जाना चाहिए। दूसरा विचार यह है कि यदि आप कोई समय-सीमा निर्धारित करते हैं तो व्यावहारिक दृष्टि से आप उस व्यक्ति को हटा रहे हैं जो उस आयु-सीमा जो हम निर्धारित करेंगे, को पूरा कर लेने के बाद भी स्वस्थ हो और जिसका दिमाग बिल्कुल दुरुस्त हो और शरीर भी चुस्त-दुरुस्त हो तथा राज्य के लिए पूरी तरह