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से अच्छी सेवा प्रदान करने की स्थिति में हो और वह यह सेवा कतिपय और वर्षों तक प्रदान कर सकता हो। मैं पूरी तरह से सहमत हूँ कि 65 वर्ष की अवस्था को किसी भी व्यक्ति की बौद्धिक योग्यता के लिए हमेशा ही शून्यकाल नहीं माना जा सकता। साथ ही मेरा मानना है कि इस आशय के संशोधन प्रस्तुत करने वाले माननीय सदस्य इस उपबंध को भूल गए हैं जो हमने अनुच्छेद 107 में किया है, जहाँ हमने यह प्रावधान किया है कि मुख्य न्यायाधीश के लिए किसी विशेष मुकदमा या मुकदमों की सुनवाई करने और उन पर निर्णय देने के लिए किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश को बुलाने का विकल्प खुला होगा। परिणामतः अनुच्छेद 107 के लागू हो जाने के बाद इस बात की कम संभावना होगी, यदि मैं यह कहूँ कि जो व्यक्ति उच्चतम न्यायालय में पहले ही अपनी सेवा दे चुका हो, उस प्रतिभा को हम नहीं खोएंगे। इसलिए मेरा यह निवेदन है कि आयु संबंधी प्रश्न पर भी बहस के दौरान जो तर्क या आशंकाएं प्रकट की गई हैं, उनका कोई आधार नहीं है।
अब मैं इस संशोधन पर हुई बहस के दौरान उठाए गए तीसरे मुद्दे पर आता हूँ और यह प्रश्न है न्यायपालिका के सदस्यों द्वारा सेवानिवृत्त के पश्चात् किसी अन्य पद को स्वीकार किया जाना। इस बारे में दो संशोधन हैं - एक तो प्रो. शाह और दूसरा श्री जसपत राय कपूर का है। व्यक्तिगत तौर पर मेरा यह मानना है कि इनमें से किसी भी संशोधन को स्वीकार नहीं किया जा सकता। यह संशोधन कुल मिलाकर कमोबेश उन्हीं उपबंधों के आधार पर प्रस्तुत किया गया है जो लोक सेवा आयोग के संबंध में प्रारूप संविधान में दिए गए हैं। यह बिल्कुल सच है कि यह प्रावधान किया गया है कि लोक सेवा आयोगों का कोई भी सदस्य लोक सेवा आयोगों से सेवानिवृत्त होने के पश्चात् कतिपय अवधि के लिए सरकार के अधीन कोई भी पद धारण करने का हकदार नहीं होगा। लेकिन, मुझे ऐसा लगता है कि न्यायपालिका के सदस्यों तथा संघ लोक सेवा आयोग के सदस्यों के बीच एक मौलिक अन्तर है और वह अन्तर यह है कि लोक सेवा आयोग सरकार की सेवा कर रहा है और उन्हीं मामलों पर निर्णय दे रहा है जिसमें सरकार के प्रत्येक क्षेत्र जुड़े होते हैं अर्थात् सिविल सेवा में किन व्यक्तियों की भर्ती की जानी है। यह बिल्कुल संभव हो सकता है कि कतिपय विभाग के प्रभारी मंत्री लोक सेवा आयोग के सदस्य को उसकी सेवानिवृत्ति के बाद कुछ दिए जाने का वायदा कर सकता है कि यदि वह कतिपय उम्मीदवार के नाम की सिफारिश कर दे जिसमें मंत्री की रुचि हो। संघ लोक सेवा आयोग और कार्यपालिका के बीच बड़ा ही नजदीकी और अभिन्न संबंध है। दूसरे शब्दों में यदि मैं यह कहूँ कि लोक सेवा आयोग हमेशा ही उन्हीं मामलों पर निर्णय देने में लगा रहता है जिनमें कार्यपालिका का महत्त्वपूर्ण हित जुड़ा होता है। न्यायपालिका उन मामलों पर निर्णय देता है जिन पर सरकार की बहुत ही कम रुचि होती है या बल्कि तथ्य तो यह है कि उसका हित बिल्कुल नहीं गिरा होता है। न्यायपालिका