46 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
नागरिकों के बीच तथा नागरिकों तथा सरकार के बीच उठे मुद्दे पर निर्णय देता है। इसके परिणामस्वरूप सरकार द्वारा न्यायपालिका के किसी सदस्य के आचरण को प्रभावित करने के बहुत कम ही आसार होते हैं और मेरा निजी विचार इसलिए यह है कि संघ लोक सेवा आयोग के मामले में जो उपबंध लागू किए गए हैं, उनका न्यायपालिका से कोई संबंध नहीं है। इसके अलावा बहुत सारे ऐसे मामले होते हैं जहां न्यायिक प्रतिभा को नियोजित करने के लिए कतिपय उद्देश्यों के लिए विशेष प्रकार की प्रतिभा का होना अति आवश्यक होता है। हमारे मित्र श्री वरदाचरयार का उदाहरण है। उन्हें आयकर से संबंधित प्रश्नों की जांच करने वाले आयोग का सदस्य नियुक्त किया गया है।
श्री जसपतराय कपूरः इसे एक अवैतनिक रूप से किए जाने का प्रावधान किया जा सकता है।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः नहीं, उन्हें इसका भुगतान किया जाता है। यह सरकार के अधीन एक लाभ का पद है।
इसलिए, इस प्रकार के पदों पर उन व्यक्तियों जिनके पास न्यायिक प्रतिभा हो, के अलावा किसकी नियुक्ति की जा सकती है? इस प्रकार का कार्य करने की प्रतिभा रखने वाले इन व्यक्तियों को ऐसे प्रावधानों जैसा कि श्री जसपतराय कपूर ने सुझाया है, के द्वारा इससे यदि वंचित किया जाता है तो यह एक बड़ी ही विकलांगता की स्थिति हो जाएगी। और मैंने यह कहा है कि कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच का संबंध इतना पृथक और विशिष्ट होता है कि कार्यपालिका के पास न्यायपालिका के निर्णय को प्रभावित करने का मुश्किल से मौका होता है। इसिलए मेरा सुझाव है कि सुझाया गया उपबंध जरूरी नहीं है और मैं सभी संशोधनों का विरोध करता हूँ।
निम्नलिखित में दो संशोधन स्वीकृत हुए।
(1) श्री संथानम द्वारा प्रस्तुत संशोधनः
फ्कि अनुच्छेद 103 के खण्ड (2) में ‘हो सकते हैं’ शब्दों के स्थान पर ‘जैसा राष्ट्रपति उचित समझे शब्द प्रतिस्थापित किए जाएं।य्
(2) श्री कामत द्वारा प्रस्तुत संशोधनः
फ्कि अनुच्छेद 103 के खण्ड (3) में निम्नलिखित उपखण्ड जोड़ा जाएः
(ग) या एक प्रख्यात न्यायविद् हो।य्
उपर्युक्त दर्शाए गए डॉ. अम्बेडकर के सभी चारों संशोधन स्वीकृत हुए। अन्य सदस्यों द्वारा प्रस्तुत किए गए सभी 18 संशोधन अस्वीकृत हुए।
¹अनुच्छेद 103, यथासंशोधित रूप में, संविधान में जोड़ा गया।ह्
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