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48 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

कूटनीतिक मिशन पर भेजा गया था। दोनों ही अवसरों पर इस प्रकार की कार्यवाही की काफी तीखी आलोचना की गई थी। मेरे मित्र श्री चिम्मनलाल शीतलावाद ने टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित अपने लेख में सरकार की कार्यवाही की ओलाचना की है। मेरी भी निजी तौर पर वही भावना थी। तथापि, वर्तमान में मैं डॉ. पी.के. सेन द्वारा प्रस्तुत संशोधन को स्वीकार करने की स्थिति में नहीं हूँ क्योंकि इसमें जिन शब्दों का प्रयोग किया गया है, वे या तो काफी विस्तृत है या कुछ मामलों में बहुत ही संकीर्ण हैं। मैं प्रारूप समिति को यह सिफारिश करने को तैयार हूँ कि इस मुद्दे पर विचार किया जाना चाहिए। उस आश्वासन के आधार पर मैं उनसे अपना संशोधन वापस लेने का अनुरोध करता हूँ।

श्री जसपतराय कपूरः मेरा यह अनुरोध है कि इस खण्ड पर कल तक कोई निर्णय नहीं लिया जाए क्योंकि हममें से बहुत सारे लोग इसका सावधानीपूर्वक अध्ययन करना चाहेंगे।

माननीय सभापतिः डॉ. अम्बेडकर हम लोगों को यह बता चुके हैं कि वह इस बारे में विचार करने के लिए प्रारूप समिति को भेजे जाने के इच्छुक हैं।

श्री जसपतराय कपूरः यह मामला समाप्त हो जाना चाहिए।

माननीय सभापतिः जब इसे प्रारूप समिति को सौंप दिया गया है तो इसका अर्थ यह है कि यह मामला समाप्त हो चुका है क्योंकि जब यह मामला फिर से वापस आएगा तो यह उसी रूप में वापस आएगा जिस रूप में प्रारूप समिति अनुमोदित करेगी।

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अनुच्छेद 104

* माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः (बम्बईः जनरल)ः महोदय मेरा अनुरोध है कि अनुच्छेद 104 को स्थगित रखा जाए।

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अनुच्छेद 106

# माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैं दोनों संशोधनों - सूची संख्या टप् की संख्या 124 और संशोधन संख्या 1883 को स्वीकार करता हूँ।

माननीय सभापतिः दो संशोधन प्रस्तुत किए गए हैं। दोनों को ही डॉ. अम्बेडकर द्वारा स्वीकार कर लिया गया है। अब मैं उन पर मत लूँगा।

* ख्., सीएडी, खण्ड VIII, दिनांक 24 मई, 1949, पृ. 375

# वही, पृष्ठ 377