55
परंतु राष्ट्रपति नियम द्वारा यह अपेक्षा कर सकेगा कि ऐसी किन्हीं दशाओं में, जो नियम में विनिर्दिष्ट की जाएं, किसी ऐसे व्यक्ति को, जो पहले से ही न्यायालय से संलग्न नहीं है, न्यायालय से संबंधित किसी पद पर संघ लोग सेवा आयोग से परामर्श करके ही नियुक्त किया जाएगा, अन्यथा नहीं।
(2) संसद द्वारा बनाई गई विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए, उच्चतम न्यायालय के अधिकारियों और सेवकों की सेवा की शर्तें ऐसी होंगी जो भारत के मुख्य न्यायाधीश या उस न्यायालय के ऐसे अन्य न्यायाधीश या अधिकारी द्वारा, जिसे भारत के मुख्य न्यायाधीश ने इस प्रयोजन के लिए नियम बनाने के लिए प्राधिकृत किया है, बनाए गए नियमों द्वारा विहित की जाएंः
देय वेतन, भत्तों और पेंशन से संबंधित या ऐसे अधिकारी तथा सेवक के संबंध में वेतन, भत्ते और पेंशन भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा राष्ट्रपति से सलाह के बाद तय किए जाएं।
(3) उच्चतम न्यायालय के प्रशासनिक व्यय, जिनके अन्तर्गत उस न्यायालय के अधिकारियों और सेवकों को या उनके संबंध में देय सभी वेतन, भत्ते और पेंशन हैं, भारत की संचित निधि पर भारित होंगे और उस न्यायालय द्वारा ली गई फीसें और अन्य धनराशियाँ उस निधि का भाग होंगी।
इस प्रारूप का उद्देश्य उच्चतम न्यायालय की स्वतंत्रता के लिए बेहतर उपबंध बनाया जाना तथा यह भी उपबंध किया जाना है कि उच्चतम न्यायालय का प्रशासनिक खर्च भारत के राजस्व से प्रभारित होगा।
महोदय, इस संशोधन में एक संशोधन है, जिसे मैं प्रस्तुत करना चाहता हूँः
परंतु इस खंड के अधीन बनाए गए नियमों के लिए, जहाँ तक वे वेतन, भत्ते, छुट्टठ्ठी या पेंशन से संबंधित हैं, राष्ट्रपति के अनुमोदन की अपेक्षा होगी।
माननीय सभापतिः इस संशोधन में श्री कपूर का एक संशोधन है।
श्री जसपतराय कपूरः इसे डॉ. अम्बेडकर द्वारा प्रस्तुत नए संशोधन में अब शामिल कर लिया गया है। अतः मैं इसे प्रस्तुत करना अनावश्यक समझता हूँ।
(संशोधन संख्या 1968 और 1969 प्रस्तुत नहीं किए गए।)
माननीय सभापतिः अब केवल डॉ. अम्बेडकर का ही एकमात्र संशोधन है। मैं पहले उनके द्वारा प्रस्तुत उन्हीं के संशोधन को लूँगा।
* * * * *
* माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः सभापति महोदय, मैं स्थिति स्पष्ट करने के लिए ही कुछ और समुक्तियाँ देना चाहूँगा। महोदय, इसमें कोई संशय नहीं है कि सभा