अनुच्छेद 122 - Page 75

56 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

आमतौर पर इस बात से सहमत है कि न्यायपालिका की कार्यपालिका से स्वतंत्रता स्पष्ट और सुनिश्चित होनी चाहिए और इसकी व्यवस्था हम कानून द्वारा कर सकते हैं। साथ ही यह भी आशंका है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता के नाम पर हम एक ऐसी स्थिति पैदा कर सकते हैं जिसे मेरे माननीय मित्र श्री टी.टी. कृष्णमाचारी ने बिल्कुल सही नाम दिया है, फ्इम्पीरियम इन इम्पीरियोय्। हम लोग फ्इम्पीरियम इन इम्पीरियोय् की स्थिति पैदा नहीं करना चाहते और साथ ही हम न्यायपालिका को पर्याप्त स्वतंत्रता भी प्रदान करना चाहते हैं ताकि वह कार्यपालिका के भय या उसके पक्षपात के बिना कार्यवाही कर सके। मेरे मित्रगण यदि नए संशोधन जिसे मैंने मूल अनुच्छेद 122 के स्थान पर प्रस्तुत किया है, के उपबंधों की सावधानीपूर्ण जांच करें, तो पाएंगे कि नए अनुच्छेद में मध्यम मार्ग अपनाने का उपबंध किया गया है। इसके अंतर्गत फ्इम्पीरियम इन इम्पीरियोय् की स्थिति पैदा होने से बचा गया है और मेरे विचार से यह बिना भय या पक्षपात के न्याय का शासन प्रदान करने के उद्देश्य के लिए न्यायपालिका को आवश्यक स्वतंत्रता भी प्रदान करता है। इसलिए, मुझे इस नए अनुच्छेद 122 में अन्तर्विष्ट सभी उपबंधों के बारे में और विस्तार से बताने की जरूरत नहीं है, क्योंकि मैं यह पाता हूँ कि इस अनुच्छेद पर हुई बहस में जिन वक्ताओं ने भाग नहीं लिया है उनके बीच भी इस बात पर आम सहमति है कि नए अनुच्छेद 122 के कतिपय खण्ड जैसे कि खण्ड (1) खण्ड (3) और खण्ड (2) भी विलक्षण हैं। केवल खण्ड (2) के परन्तुक पर कुछ मतभेद दिखाई पड़ता है। मूल परन्तुक में, यह प्रावधान था कि न्यायाधीशों के वेतन, भत्तों और अन्य सारी चीजों के बारे में मुख्य न्यायाधीश राष्ट्रपति के परामर्श से निर्णय लेंगे। संशोधित परन्तुक यह उपबंध करता है कि मुख्य न्यायाधीश यह कार्य राष्ट्रपति के अनुमोदन से करेगा और वास्तव में जो प्रश्न है वह यह है कि मूल प्रावधान जिसके अनुसार इस कार्य को राष्ट्रपति के परामर्श से किया जाना चाहिए या फिर इसे राष्ट्रपति के अनुमोदन से किया जाना चाहिए, इन दो विकल्पों में से हमें किसका चुनाव करना चाहिए। इसमें कोई संशय नहीं है कि पूल मसौदों फ्राष्ट्रपति से सलाह-मशविराय् ऐसा लगता है और ऐसा है कि अंतिम फैसला लेने का अधिकार राष्ट्रपति को सौंपना चाहता है, महोदय इस विषय पर विचार करने से पहले दो विचारों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। पहला यह है कि संघीय अदालत के बारे में वर्तमान में क्या प्रावधान है?य् अगर माननीय सदस्य अंगीकार नहीं किए गए ‘गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट, 1935’ की धारा 216 की उप-धारा (2) पर नजर डालें तो वे पाएंगे कि वहाँ दिए गए प्रावधान इस पर ‘मंजूरी का अधिकार’ मैं खेदपूर्वक कहना चाहूँगा कि यह धारा 242 की उप-धारा (4) है - गवर्नर जरनल को दिया गया था। इस आधार पर हम वास्तव में वर्तमान स्थिति को ही बनाए रख रहे हैं। मेरे खयाल में हमारा विचार यह है कि जिसमें इसका समर्थन किया गया है कि हम इस मुहावरे को बनाए रखें कि फ्राष्ट्रपति की मंजूरी सेय् और यह

* ख्., सीएडी, खण्ड VIII, दिनांक 27 मई, 1949, पृ. 397-99