अनुच्छेद 122 - Page 76

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सही है। बिना किसी संदेह के यह होना चाहिए कि राज्य के कर्मचारियों के वेतन, भत्ते और पेंशन एक समान हों और लोक सेवा के संदर्भ में इनमें कोई अंतर नहीं होना चाहिए। इसमें सरकारी खजाने पर फालतू का बोझ पड़ सकता है। अब यदि आप इस मामले को मुख्य न्यायाधीश पर निर्णय के लिए छोड़ते हैं तो इस बात की बिल्कुल संभावना हो सकती है - मैं यह नहीं कहता कि ऐसा होगा ही - लेकिन इस बात की पूरी संभावना है कि मुख्य न्यायाधीश वेतन, पेंशन और भत्ते इस प्रकार से निर्धारित कर दें जो कि न्यायपालिका के अ लावा अन्य विभागों में कार्यरत सिविल सेवकों से बहुत ही भिन्न हों और मैं नहीं समझता कि इस प्रकार की स्थिति एक वांछनीय बात होगी और इसके परिणामस्वरूप मैंने अपने निर्णय से एक नया प्रारूप और नया संशोधन तैयार कराया है, जिसे मैंने सभापटल पर रखा है और जिसमें इस मामले का समुचित समाधान निकाला गया है और मुझे आशा है कि सभा मूल परन्तुक के स्थान पर इसे स्वीकार करेगी।

मैं एक अन्य मामले का भी उल्लेख करना चाहता हूँ। यद्यपि इसके बारे में मेरे संशोधन में प्रावधान नहीं किया गया है न ही इस बहस पर भाग लेने वाले सदस्यों ने इसका उल्लेख किया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि मेरे नए अनुच्छेद 122 के खण्ड (3) के द्वारा हमने यह उपबंध किया है कि उच्च्तम न्यायालय के प्रशासनिक खर्चों पर भारत के राजस्व से प्रभारित किया जाएगा लेकिन, प्रश्न यह है कि खण्ड 3 में अन्तर्विष्ट यह उपबंध न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सुरक्षित करने के उद्देश्य से पर्याप्त है। अब मैं स्वयं अपनी ओर से बोलते हुए यह कहना चाहता हूँ कि मेरे विचार से यह खण्ड न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सुरक्षित करने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। आखिरकार जब हम यह कहते हैं कि विशेष खर्चा राज्य की संचित निधि से प्रभारित होगा, तो उसका क्या अर्थ है? इसका जो कुल मिलाकर अर्थ है कि इसके बारे में मतदान कराने की जरूरत नहीं है। इसका और कोई अर्थ नहीं है। हमने स्वयं ही यह कहा है कि यदि किसी विशेष प्रभार को भारत के राजस्व से प्रभारित किए जाने वाले प्रभार के रूप में घोषित किया जाता है तो जो स्थिति पैदा होगी वह यह है कि इस पर मतदान कराने की जरूरत नहीं पड़ेगी यद्यपि इस पर विधानमंडल द्वारा चर्चा किए जाने का विकल्प रहेगा। इसलिए हमने जो उपबंध किए हैं उनके अनुसरण में अनुच्छेद 122 के खण्ड (3) को पढ़ने से यह अर्थ निकलता है कि न्यायपालिका से संबंधित बजट के भाग को विधानमंडल द्वारा वार्षिक तौर पर लेखानुदान कराने की जरूरत नहीं पड़ेगी। लेकिन, मेरे विचार में यह एक ऐसा प्रश्न है जो मामले की जड़ तक जाता है और इसे बात की प्राथमिकता मिलनी चाहिए कि इस बात का निर्धारण कौन करेगा कि उच्चतम न्यायालय की कया-क्या जरूरतें हैं। हमने इस प्रकार का कोई भी प्रावधान नहीं किया है। हमने इस मामले को निर्धारित करने के लिए पूरी तरह से कार्यपालिका पर छोड़ दिया है कि न्यायपालिका के लिए वर्ष-दर-वर्ष कितनी धनराशि आवंटित की जानी चाहिए। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि यह एक बड़ी ही कमजोर स्थिति है और इसमें सुधार किए जाने