अनुच्छेद 124 - Page 77

58 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

की जरूरत है। इस चरण में मैं सिर्फ सभा का ध्यान भारत सरकार अधिनियम, 1935 की धारा 216 में अन्तर्विष्ट उपबंधों की ओर दिलाना चाहता हूँ जिनमें यह कहा गया है कि गवर्नर जनरल अपने द्वारा व्यय प्राक्कलन से संबंधित मामले को फैडरल विधानमण्डल के चैम्बरों के समक्ष प्रस्तुत करते समय फैडरल न्यायालय के प्रशासनिक खर्चों के संबंध में शामिल की जाने वाली धनराशि के बारे में व्यक्तिगत तौर पर अपना निर्णय लेगा। ताकि यदि कार्यपालिका फैडरल न्यायालय को समुचित रूप से चलाने के लिए आवश्यक धनराशि के बारे में मुख्य न्यायाधीश के आकलन से अलग मत व्यक्त करता है तो गवर्नर जनरल उस मामले में हस्तक्षेप करके यह निर्णय ले सके कि कितनी धनराशि आवंटित की जानी चाहिए। हम लोग जिस ढांचे पर अपने संविधान को अंगीकार कर रहे हैं, उस मामले में इस उपबंध का अब निश्चय ही कोई मतलब नहीं रह जाता है और इसलिए मेरे विचार से अब हमें मुख्य न्यायाधीश तथा उसके प्रशासन को चलाने के लिए पर्याप्त धनराशि सुरक्षित कराने के लिए कोई और अन्य तरीका ढूंढना चाहिए। मैं इस समय उस अनुच्छेद में और कोई विलम्ब नहीं करना चाहता। मैं तो सभा के समक्ष केवल इसका उल्लेख कर रहा हूँ ताकि यदि वह इस पर विचार करे तो उस मुद्दे को शामिल करने हेतु बाद में कुछ उपयुक्त संशोधन लाया जा सकता है जोकि एक वांछनीय स्थिति होगी।

¹डॉ. अम्बेडकर के दोनों संशोधन स्वीकृत हुए। अनुच्छेद 122 यथासंशोधित रूप में संविधान में जोड़ा गया।ह्

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अनुच्छेद 124

* माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर (बंबई - जनरल)ः सभापति महोदय, मैं यह नहीं कर सकता कि प्रारूप संविधान में तथा इसके अनुच्छेदों में प्रस्तुत संशोधनों में से जो स्थिति बनी है, उससे मैं प्रसन्न हूँ। मेरी स्वयं की राय है कि यह गणमान्य व्यक्ति या अधिकारी भारत के संविधान में उल्लिखित सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अधिकारी है। उस व्यक्ति पर यह देखने की जिम्मेदारी है कि संसद द्वारा पारित खर्च से अधिक खर्च न हो या संसद द्वारा निर्धारित विनियोग अधिनियम में उल्लिखित खर्च और वास्तव में किए गए खर्च के बीच अंतर नहीं हो। यदि इस अधिकारी द्वारा अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन किया जाना अपेक्षित है, तो उसका कर्त्तव्य न्यायपालिका के कर्त्तव्यों से भी कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है - निश्चय ही इसे न्यायपालिका जितनी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। लेकिन उच्चतम न्यायालय से संबंधित अनुच्छेदों तथा लेखामहापरीक्षक से संबंधित अनुच्छेदों से इसकी तुलना करने पर मुझे यह कहने में हिचक नहीं है कि हमने उसे न्यायपालिका

* ख्., सीएडी, खण्ड VIII, दिनांक 30 मई, 1949, पृ. 407-08