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जितनी अधिक स्वतंत्रता नहीं दी। यद्यपि निजी तौर पर मेरा मानना है कि उसे न्यायपालिका से भी अधिक स्वतंत्रता दी जानी चाहिए थी।
हमने न्यायपालिका को जो स्थिति प्रदान की है तथा लेखामहापरीक्षक की जो स्थिति प्रदान किए जाने का विचार है उसके बीच जो अंतर है उसके बारे में मैं बता सकता हूँ। पिछले सप्ताह ही हमने मूल अनुच्छेद 122 में एक संशोधन प्रस्तुत करके उच्चतम न्यायालय को अपने अधिकारियों और कर्मचारियों की नियुक्ति करने की शक्ति प्रदान की गई है। मैं यह पाता हूँ कि लेखामहापरीक्षक को ऐसी कोई शक्ति प्रदान नहीं की गई है। इस प्रकार की कोई शक्ति नहीं होने का अर्थ है कि महालेखापरीक्षक के कर्मचारियों की नियुक्ति कार्यपालिका करेगी। कार्यपालिका द्वारा नियुक्त किए जाने के परिणामस्वरूप अनुशासनिक कार्यवाही के लिए, कर्मचारी कार्यपालिका के विषयाधीन होंगे। मेरे मन में तनिक भी संशय नहीं है कि यदि किसी अधिकारी के पास अपने अधीनस्थ कर्मचारियों के ऊपर अनुशासनिक नियंत्रण की शक्ति प्राप्त नहीं है, तो उसके प्रशासन का मनोबल कमजोर रहेगा। उस दृष्टि से मेरा यह विचार था कि महालेखापरीक्षक को इस प्रकार की शक्ति प्रदान किया जाना लोगों के हित में होता। लेकिन उसे इस प्रकार की शक्ति प्रदान किए जाने के मामले में सभा की भावना उसके विरुद्ध रही है। वर्तमान में मेरा मानना है कि आज की जो भावना व्याप्त है, उससे संतुष्ट रहने के अलावा और कुछ नहीं किया जा सकता। यह मेरा समान दृष्टिकोण है।
संशोधनों पर आते हुए मैं यह कहना चाहता हूँ कि श्री टी.टी. कृष्णमाचारी द्वारा प्रस्तुत किए गए संशोधनों तथा श्री बी. दास द्वारा प्रस्तुत संशोधन संख्या 1975 को मैं स्वीकार करता हूँ। इन संशोधनों से निश्चय ही महालेखापरीक्षक की स्थिति में बहुत हद तक सुधार होगा जो कि उसे प्रारूप संविधान या विभिन्न संशोधनों के माध्यम से प्रदान की गई है। लेकिन मैं यह पाता हूँ कि इन संशोधनों के माध्यम से संशोधित किए गए अनुच्छेद के बावजूद श्री सिधवा को शिकायत है। यदि मैं उनकी बात को समुचित रूप से समझ पाया हूँ तो उनकी शिकायत है कि लेखामहापरीक्षक पर होने वाले खर्च समुचित निधि से प्रभारित नहीं होने चाहिएं, बल्कि उन्हें भी एक सामान्य पूर्ति और सेवाओं का एक अंग माना जाना चाहिए तथा उसे संसद से लेखानुदान प्राप्त कर लिया जाना चाहिए। उन्होंने इसका कोई सही कारण नहीं बताया कि संसद महालेखापरीक्षक पर होने वाले खर्चे के प्रभारों तथा प्रशासनिक खर्चों पर चर्चा करने से वंचित क्यों रहे। मैं समझता हूँ कि मेरे माननीय मित्र श्री सिंधवा भारत के राजस्व से प्रभारित किए जाने वाले कतिपय खर्चों से क्या अर्थ है, उसको पूरी तरह से गलत समझ बैठे हैं। यदि मेरे माननीय मित्र श्री सिंधवा अनुच्छेद 93 जो कि इस मामले से संबंधित है, पर गौर करें तो पाएंगे कि यद्यपि कतिपय खर्च भारत के राजस्व से प्रभारित किए जा सकते हैं, केवल इस तथ्य के आधार पर ऐसा किया गया है, संसद उन प्रभारों पर खर्चा करने के अधिकार से वंचित नहीं हो जाती। उसे यह चर्चा करने