62 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
* माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः महोदय, मैं मेरे मित्र श्री कुंजरू का संशोधन स्वीकार करने को तैयार हूँ बशर्ते वह फ्यह किसी स्थानीयय् शब्दों को हटाने के लिए तैयार हैं।...... +
पंडित हृदयनाथ कुंजरूः मैंने उन्हें हटा दिया है।
माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः चूँकि स्थानीय लेखा परीक्षण प्रान्तीय सरकारों के नियंत्रण के अधीन होता है। इसलिए, मेरी राय में फ्अन्य प्राधिकारय् शब्दों को जोड़ना आवश्यक ओर उपयोगी हो सकता है। जैसा कि उन्होंने स्वयं ही कहा है कि आज भारत सरकार की नीति इन उपकरणों को प्रबंधित करने के लिए बहुत सारे निगम बनाए जाने की है क्योंकि विभागीय तौर पर उनका प्रबंधन किया जाना संभव नहीं है और इसके परिणामस्वरूप यह आवश्यक है कि भारत सरकार इन निगमों के लेखापरीक्षण के लिए कुछ प्रावधान करे। ऐसी स्थिति में मेरे विचार से केन्द्रीय सरकार को महालेखा परीक्षक को इन सभी प्राधिकरणों के लेखाओं का लेखापरीक्षण करने की अनुमति दिया जाना वांछनीय है। मैंने यह सुझाव दिया है, जिसमें संशोधन किया जा सकता है और मैं उस संशोधन को स्वीकार करने के लिए तैयार हूँ।
मेरे मित्र श्री सिंधवा ने जो मुद्दा उठाया है कि महालेखापरीक्षक के कर्त्तव्यों से संबंधित थे, अधिकार नियम कार्यपालिका द्वारा बनाए जाते हैं और जो संशोधन मैंने सुझाया है वह उन्हीं व्यवस्था को जारी रखने की शक्ति प्रदान करती हैं जोकि पहले से लागू हैं और इस प्रकार से हम व्यावहारिक तौर पर कार्यपालिका को महालेखापरीक्षक के कर्त्तव्य करने का प्राधिकार दे रहे हैं। स्पष्ट है कि यह एक असंगत स्थिति है कि वित्त प्रशासन के मामले में कार्यपालिका सरकार पर नियंत्रण रखने की जिम्मेदारी जिस अधिकारी को दी जाती है उसके ही कर्त्तव्यों का निर्धारण कार्यपालिका द्वारा बनाए गए नियमों से हो। अब मैं अपने माननीय मित्र श्री सिधवा को लेकर यही उत्तर दे सकता हूँ कि यह उपबंध बहुत हद तक विद्यमान भारत सरकार अधिनियम, 1935 की धारा 151 से सीधे ले लिया गया है जो कि सरकारी धन के संरक्षण से संबंधित है, तथा धारा 166 जो कि महालेखापरीक्षक के कर्त्तव्यों के संबंध में गवर्नर जनरल द्वारा बनाए गए नियमों से संबंधित है, से सीधे ले लिया गया है। उस अधिनियम की योजना के अधीन गवर्नर जनरल द्वारा अपने स्वविवेक का निर्णय करते हुए नियम बनाया जाना अपेक्षित है अर्थात् इन नियमों को बनाने में उसे अपने मंत्रालय से परामर्श लेना आवश्यक नहीं है। उस हद तक महालेखापरीक्षक के कर्त्तव्यों को निर्धारित करने वाले उसके द्वारा बनाए गए नियम निःसंदेह कार्यपालिका से स्वतंत्र होंगे। आज हम राष्ट्रपति को स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने
* ख्., सीएडी, खण्ड VIII, दिनांक 30 मई, 1949, पृ. 414-15
# डाट्स व्यवधान को दर्शाता हैं।