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विचार करना अनावश्यक हो जाएगा। इसलिए, मेरा सुझाव यह होगा कि अभी श्री गुप्ते का संशोधन संख्या 2010 और उसके बाद श्री कामत का संशोधन तथा फिर संशोधन संख्या 2015 को लेना वांछनीय होगा। यदि यह मामला पहले लिया जाता है और सभा इस निष्कर्ष पर पहुँचती है कि क्या राष्ट्रपति की नियुक्ति किए जाने का सिद्धांत स्वीकार किया जाना चाहिए तो स्पष्ट है कि अनुच्छेद 131 से संबंधित इन वैकल्पिक तरीकों के बारे में चर्चा करने से किसी उद्देश्य की प्राप्ति नहीं होगी। मेरा तो यही सुझाव है जोकि आपके विनिर्णय पर निर्भर करता है।
माननीय सभापतिः बहुत सारे संशोधन प्रस्तुत किए गए हैं जिनमें राष्ट्रपति के चुनाव या नियुक्ति के विचार का समर्थन किया गया है। अन्य संशोधन चुनाव के तरीके से संबंधित हैं। सबसे पहले मैं चुनाव के प्रश्न से छुटकारा पाना चाहता हूँ ताकि चुनाव के तरीके से संबंधित सभी संशोधनों को लिया जा सके। फिर हम नियुक्ति के प्रश्न को ले सकते हैं और उस स्थिति में नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जा सकेगी।
श्री अलादी कृष्णस्वामी अय्यर (मद्रासः जनरल)ः यदि नियुक्ति की जाए या नहीं, के प्रश्न को पहले नहीं लिया जाता है, तो उससे स्वतः ही चुनाव का प्रश्न समाप्त हो जाएगा। मैं इस मामले में डॉ. अम्बेडकर के विचार से सहमत हूँ।
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* माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकर (बम्बईः जनरल)ः सभापति महोदय, संशोधन पर इतनी लम्बी बहस होने के बाद मैं समझता हूँ कि सभा में अब लम्बा भाषण देकर सभा का समय लेना बिल्कुल अनावश्यक है। मैं केवल दो बातें स्पष्ट करना चाहता हूँ_ एक तो सभा को उसके समक्ष प्रारूप समिति द्वारा रखे गए दो विकल्पों तथा संशोधन संख्या 2015 जिस पर कल से बहस चल रही है, के बीच क्या अन्तःसंबंध हैं, उसके बारे में बताना चाहूँगा। मेरा दूसरा प्रयोग यह है कि सभा को यह बताया जाए कि उसके समक्ष वास्तविक मुद्दा क्या है ताकि सभा यह जान सके कि प्रारूप समिति तथा नए संशोधन द्वारा प्रस्तुत विकल्पों के बारे में निर्णय लेते समय ये सब बातें उसके ध्यान में हों।
महोदय, प्रारूप समिति ने जो पहला विकल्प प्रस्तुत किया है, वह इस सभा द्वारा कुछ समय पहले लिए गए निर्णय के अनुसरण में लिया गया है कि प्रान्तीय संविधान को शासित करने वाले सिद्धांतों पर निर्णय लेने के लिए गठित की गई समिति की सिफारिशों के अनुरूप निर्णय लिया जाएगा। प्रारूप समिति के सामने उस मामले में कोई विकल्प नहीं था क्योंकि उसे दिए गए निर्देशों के अनुसार वह उस सिद्धांत को स्वीकार करने के लिए बाध्य था जिसे सभा ने स्वयं ही मंजूर किया हुआ था। इसलिए, प्रश्न यह उठता
* ख्., सीएडी, खण्ड VIII, दिनांक 31 मई, 1949, पृ. 467-69