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66 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

हैः कि प्रारूप समिति एक विकल्प प्रस्तुत किए जाने को उपयुक्त क्यों मानती है? अब प्रारूप समिति ने जो एक विकल्प प्रस्तुत किया था उसका कारण यह है। प्रारूप समिति ने यह महसूस किया जैसा कि इस सभा में प्रत्येक व्यक्ति को जानकारी है कि राज्यपाल के पास करने के लिए कोई कार्य नहीं होता है - इस बारे में एक जानी-पहचानी कहावत-सी बन गई है कि फ्उसे अपने विवेक या अपने निर्णय के अनुरूप कोई भी कार्य करने की जरूरत ही नहीं है।य् नए संविधान के सिद्धान्तों के अनुसार, उसके लिए सभी मामलों में अपने मंत्रालय की सलाह मानना आवश्यक है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए यह महसूस किया गया है कि क्या मतदाताओं पर किसी एक चुनावी प्रक्रिया में भाग लेने का बोझ डालना वांछनीय है, जिसमें काफी समय बर्बाद होगा, बहुत सारी दिक्कतें आएंगी और बहुत सारे पैसे भी खर्च होंगे। यह भी महसूस किया गया कि किसी को भी इस बात की पूरी जानकारी नहीं होगी कि चुनाव लड़ने के बाद उसे संविधान के अंतर्गत क्या शक्ति प्राप्त होने की संभावना है। हमने यह महसूस किया कि राज्यपाल की शक्तियाँ इतनी सीमित और इतनी कम हैं तथा उसकी स्थिति इतनी अधिक आडम्बरपूर्ण है कि संभवतः उस पद पर चुनाव लड़ने के लिए बहुत कम लोग आएंगे। यही कारण था कि प्रारूप समिति ने दूसरे विकल्प अपनाने का सुझाव दिया।

बहस के दौरान चुनाव कराए जाने के विरोध में यह तर्क दिया गया कि इससे प्रधानमंत्री और राज्यपालों के बीच एक प्रकार की प्रतिद्वन्दिता की स्थिति पैदा होगी क्योंकि दोनों ही लोग जनादेश प्राप्त करके आएंगे। जहाँ तक मेरी सोच का प्रश्न है मैं उस तर्क से प्रभावित नहीं हुआ क्योकि मैं इस बात को स्वीकार नहीं करता हूँ कि चुनाव होने की स्थिति के अन्तर्गत भी प्रधानमंत्री और राज्यपाल के बीच किसी प्रकार की प्रतिद्वन्दिता की स्थिति पैदा होगी। क्योंकि इसका एक साधारण कारण यह है कि प्रधानमंत्री किसी नीति के आधार पर जबकि राज्यपाल नीति के आधार पर नहीं चुना जाएगा। क्योंकि यदि उसके पास कोई नीति नहीं होगी तो उसे किसी प्रकार की शक्ति भी प्राप्त नहीं होगी। जहाँ तक मैं सोच पा रहा हूँ, राज्यपाल का चुनाव उसके व्यक्तित्व के आधार पर होगाः अपने दर्जे, अपने चरित्र, अपनी शिक्षा, लोगों के बीच अपनी स्थिति आदि के आधार पर वह राज्यपाल के पद को भरने के लिए क्या सही व्यक्ति है? प्रधानमंत्री के मामले में स्थिति यह होगी_ क्या उसका कार्यक्रम उपयुक्त है, क्या उसका कार्यक्रम सही है? इसलिए यदि हम चुनाव के सिद्धांत को भी स्वीकारते हैं तो किसी प्रकार का विवाद पैदा नहीं हो सकता।

दूसरा तर्क है, यदि हम ऐसा राज्यपाल बनाने का प्रावधान रखने जा रहे हैं जोकि पूरी तरह से सजावटी पद है, तो क्या ऐसे पद के लिए इतने अधिक खर्च और इतनी अधिक कठिनाई झेलकर चुनाव कराना आवश्यक है? इसी भावना के कारण प्रारूप समिति ने दूसरा विकल्प सुझाया है। अब इस संभा में जो बहस हुई है, उससे मेरे मन में यह धारणा