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बनी है कि अधिकतर वक्ताओं का यह मानना है कि प्रारूप समिति द्वारा सुझाए गए दूसरे विकल्प तथा इस विशेष संशोधन के बीच काफी गुणात्मक और मौलिक भिन्नता है। मेरे विचार से दूसरे विकल्प तथा इस संशोधन के बीच कोई मौलिक अन्तर नहीं है। प्रारूप समिति द्वारा सुझाए गए दूसरे विकल्प में भी नाम-निर्देशित किए जाने का प्रस्ताव किया गया है। केवल एक बात है कि इसमें कतिपय योग्यताएं रखी गई हैं। अर्थात् राष्ट्रपति प्रान्तीय विधानमंडल द्वारा चुने गए पैनल के व्यक्तियों में से ही इस पद के लिए नाम-निर्देशित करें। लेकिन, मूलतः यह नाम-निर्देशित किए जाने का ही प्रस्ताव है। उस अर्थ में प्रारूप समिति द्वारा प्रस्तुत किए गए दूसरे विकल्प तथा श्री बृजेश्वर प्रसाद द्वारा सभापटल पर रखे गए संशोधन के बीच कोई महत्त्वपूर्ण और मौलिक अन्तर मौजूद नहीं है। यदि दूसरे शब्दों में कहूँ तो सभा के समक्ष दूसरे विकल्प तथा इस संशोधन के बीच किसी एक को चुनने का विकल्प मौजूद है। संशोधन में कहा गया है कि नाम-निर्देशन के लिए कोई योग्यता निर्धारित नहीं की जानी चाहिए। दूसरे विकल्प में कहा गया है कि नाम-निर्देशन में योग्यता निर्धारित की जानी चाहिए, जिसे कतिपय शर्तों के विषयाधीन रखा जाना चाहिए। कतिपय दृष्टि से विचार करने पर मुझे भी यह प्रतीत होता है कि प्रारूप समिति का जो प्रस्ताव है अर्थात् नाम-निर्देशन के साथ योग्यता निर्धारित की जानी चाहिए, वह साधारण नाम-निर्देशन की तुलना में एक बेहतर विकल्प है। साथ ही मैं सभा को सावधान करना चाहता हूँ कि सभा के समक्ष वास्तविक मुद्दा वस्तुतः नाम-निर्देशन या चुनाव का नहीं है - क्योंकि मैं यह कह चुका हूँ कि यह पद पूरी तरह से सजावटी पद बनने जा रहा है_ इस पद पर किसी व्यक्ति की नियुक्ति किस प्रकार होती है, उसकी नियुक्ति नाम-निर्देशन से होती है अथवा किसी अन्य तरीके से, यह एक पूरी तरह से मनोवैज्ञानिक प्रश्न है - अधिकतर लोगों को कौन-सी स्थिति अच्छी लगेगी - कोई नाम-निर्देशित व्यक्ति या फिर ऐसे व्यक्ति का नाम-निर्देशन जिसमें विधानमण्डल ने किसी रूप में भाग लिया हो। उसके आगे मुझे नहीं लगता कि इसका और कोई निहितार्थ है। इसलिए, मैं सभा को यह कहना चाहता हूँः कि सभा के समक्ष वास्तविक मुद्दा नाम-निर्देशन या चुनाव का नहीं है बल्कि मुद्दा यह है कि आप अपने राज्यपाल को क्या शक्ति देने का प्रस्ताव करते हैं। यदि राज्यपाल का पद विशुद्ध रूप से एक संवैधानिक राज्यपाल बनाए जाना है जिसे उससे अधिक शक्ति नहीं प्रदान की जानी है। जितनी कि हमने अधिनियम में उसे प्रदान करने का विचार किया है और उसे प्रान्तीय मंत्रालय के आन्तरिक प्रशासन में हस्तक्षेप करने की कोई शक्ति नहीं दी जानी है, तो निजी तौर पर मुझे नाम-निर्देशन के सिद्धांत पर कोई मौलिक आपत्ति नहीं है। इसलिए, मेरा यह निवेदन है ...
श्री रोहिणी कुमार चौधरीः क्या वह किसी ऐसी स्थिति पर विचार कर सकते हैं जहां कोई राज्यपाल जिसे आप महज प्रतीक समझें या नहीं, उसे मंत्रालय गठित करने