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68 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

की शक्ति नहीं होगी? क्या वह किसी भी व्यक्ति को सरकार गठित करने के लिए आमंत्रित करने में सक्षम नहीं होगा चाहे उस व्यक्ति के पास बड़ा बहुमत हो या नहीं हो? और वह एक बड़ी शक्ति है जिससे उसे किसी भी परिस्थितियों के अधीन वंचित नहीं किया जा सकता।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः ठीक है वह शक्ति तो उसे प्राप्त होगी, चाहे वह चुना हुआ राज्यपाल हो या नाम-निर्देशित राज्यपाल। यदि वह किसी गलत व्यक्ति को सरकार गठित करने के लिए आमंत्रित करता है, तो उसे उसकी कीमत शीघ्र चुकानी होगी, जब वह पाएगा कि उसने एक गलत विकल्प चुना है। और वह कोई ऐसी बात नहीं है जिसे कोई चुना हुआ राज्यपाल नहीं कर सकता। ऐसे किसी राज्यपाल का अपना कोई मित्र हो सकता है जिसे वह सरकार गठित करने के लिए आमंत्रित कर सकता है और उस मुद्दे को सभा द्वारा स्वयं ही अविश्वास अथवा विश्वास प्रस्ताव के माध्यम से निपटाया जा सकता है। लेकिन प्रश्न का यह पहलू कोई महत्त्वपूर्ण नहीं है। प्रश्न का महत्त्वपूर्ण पहलू है कि क्या राज्यपाल को सरकार, जिसे स्थानीय विधानमंडल में बहुमत प्राप्त है, के कामकाज में हस्तक्षेप करने की कोई शक्ति प्रदान की जाएगी? यदि उस राज्यपाल के पास उस सरकार, जिसके पास बहुमत है, के आन्तरिक प्रशासन में हस्तक्षेप करने की कोई शक्ति नहीं होगी तो मुझे लगता है कि यह जो प्रश्न है कि उसका नाम-निर्देशन होना चाहिए या चुनाव होना चाहिए, पूरी तरह से अप्रासंगिक है। मैं इसको इसी नजरिए से देखता हूँ और मैं सभा को बताना चाहता हूँ कि वह इस बारे में निर्णय लेते समय इस बारे में अधिक नहीं सोचें कि राज्यपाल के पद पर चयन नाम-निर्देशन के माध्यम से होना चाहिए या चुनाव के माध्यम से, क्योंकि वह कमोबेश एक शैक्षणिक प्रश्न है - उन लोगों को अपने मन में इस प्रश्न को रखना चिहएः राज्यपाल को कौन-सी शक्ति देने जा रहे हैं? मैं समझता हूँ कि हमारे सामने आज यह मामला नहीं है। हम बाद में इसे लेंगे जब हम अनुच्छेद 175 और 188 के प्रश्न पर आएंगे और संभवतः संशोधन के द्वारा अथवा कुछ अन्य खण्ड को जोड़कर उसे शक्ति प्रदान करेंगे। सभा को इन नई धाराओं के बारे में सतर्क तथा सावधान रहना चाहिए जब बाद में ये उनके समक्ष लाई जाएंगी। लेकिन आज मुझे लगता है कि यदि संविधान उसी सिद्धांत को स्वीकार करता है जो हमारी मंशा रही है कि राज्यपाल का पद विशुद्ध रूप से संवैधानिक राज्यपाल का होना चाहिए, जिसके पास प्रान्त के प्रशासन में हस्तक्षेप करने की शक्ति नहीं होनी चाहिए तो मुझे यह प्रश्न बिल्कुल अर्थहीन लगता है कि उसका चयन नाम-निर्देशन के आधार पर होना चाहिए अथवा चुनाव के माध्यम से।

श्री एल. कृष्णास्वामी भारतीः क्या माननीय संशोधन को स्वीकार कर रहे हैं?

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मैं इसे सभा के विवेक पर छोड़ रहा हूँ।