अनुच्छेद 143 - Page 95

76 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः इससे बिल्कुल फर्क नहीं पड़ता है। अधिनियम की तिथि मायने नहीं रखती।

श्री एच.वी. कामतः लगभग एक शताब्दी पहले।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मेरा यही उत्तर है। कनाडा-वासियों तथा ऑस्ट्रेलिया वासियों ने इस चरण में भी इस उपबंध को हटाना जरूरी नहीं समझा है। वे लोग इस बात से पूरी तरह संतुष्ट हैं कि कनाडा अधिनियम की धारा 55 में उल्लिखित इस प्रावधान को बनाए रखना जिम्मेदार सरकार के बिल्कुल अनुरूप है। यदि उन लोगों ने ऐसा अनुभव किया होता कि यह उपबंध जिम्मेदार सरकार की संकल्पना के अनुरूप नहीं है तो वे लोग आज भी डोमेनियन के रूप में पूरे अधिकार से इस उपबंध को समाप्त कर सकते हैं। उन्होंने ऐसा नहीं किया है। इसिलए, पंडित कुंजरू के प्रश्न का उत्तर देते हुए मैं यह कह सकता हूँ कि कनाडावासियों तथा ऑस्ट्रेलियावासियों ने ऐसा नहीं सोचा है कि इस प्रकार का उपबंध जिम्मेदार सरकार का उल्लंघन करते हैं।

श्री लोकनाथ मिश्र (उड़ीसा - जनरल)ः महोदय, मेरा एक औचित्य का प्रश्न है क्या हमें कनाडा या ऑस्ट्रेलिया का दर्जा मिलने जा रहा है? या हम एक गणराज्य का संविधान बनाने जा रहे हैं?

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः उनकी बात को समझ नहीं सका। यदि सभा इस बात से संतुष्ट हो, जैसा कि मैं ऐसा करता हूँ कि राज्यपाल में कतिपय विवेकाधीन शक्तियाँ निहित किए जाने का विद्यमान उपबंध जिम्मेदार सरकार के विरुद्ध या असंगति में है, इस बारे में कोई विवाद नहीं हो सकता कि इस खण्ड को बनाए रखना वांछनीय है और मेरे विचार से तो यह आवश्यक है। एकमात्र प्रश्न यह उठता है ...

पंडित हृदयनाथ वुंँजरूः ठीक है डॉ. अम्बेडकर आलोचना के मुद्दे को पूरी तरह से छोड़ चुके हैं। आलोचना का विषय यह नहीं है कि अनुच्छेद 175 में राज्यपाल को कुछ शक्तियां नहीं दी जानी चाहिएं, अनुच्छेद जिस पर चर्चा हो रही है, के अन्तर्गत सामान्य प्रकृति की कतिपय विवेकाधीन शक्तियाँ राज्यपाल में निहित किए जाने की आलोचना हो रही है।

माननीय डॉ. बी.आर. अम्बेडकरः मेरे विचार से उन्होंने अनुच्छेद को गलत पढ़ लिया है। मुझे खेद है कि मेरे पास इस समय प्रारूप संविधान की प्रति नहीं है। फ्जहां तक उसे या इस संविधान के अंतर्गत को छोड़करय् शब्दों का प्रयोग किया गया है। यदि इन शब्दों का प्रयोग किया गया होता तो उन स्थितियों को छोड़कर जब वह ऐसा सोचता हो कि उसे मंत्रियों की इच्छा के विरुद्ध या उनके द्वारा दी गई सलाह के विरुद्ध विवेकाधीन शक्ति का प्रयोग करना चाहिए फ्तो फिर मेरे विचार से मेरे माननीय मित्र पंडित कुँजरू द्वारा की गई आलोचना वैध होती। यह खण्ड बड़ा ही सीमित खण्ड है जिसमें