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कहा गया है किः फ्जहाँ तक उसे या इस संविधान के अंतर्गत को छोड़करय् इसलिए अनुच्छेद 143 को कुछ अन्य अनुच्छेदों के साथ मिलाकर पढ़ना होगा जिनमें राज्यपाल के लिए विशेष तौर पर शक्ति आरक्षित की गई है। यह कोई सामान्य खण्ड नहीं है, जिसमें राज्यपाल को किसी भी मामले में अपने मंत्रियों की सलाह की अवहेलना करने की शक्ति नहीं दी गई है जिसे वह मानता है कि उसे उसकी अवहेलना करनी चाहिए। इसलिए मैं समझता हूँ कि मेरे माननीय मित्र पंडित कुँजरू का तर्क सही नहीं है।
इसलिए, जैसा कि मैं बता चुका हूँ कि विनिर्दिष्ट मामलों में राज्यपाल में निहित विवेकाधीन शक्ति को बनाए रखना जिम्मेदार सरकार की प्रणाली के असंगत नहीं है। एकमात्र प्रश्न जो उठता है, वह यह है कि हम इस विवेकाधीन शक्ति का उल्लेख किस प्रकार से करें? मुझे ऐसा लगता है कि तीन तरीके से इसे किया जा सकता है। एक तरीका तो यह है कि अनुच्छेद 143 से इन शब्दों को हटा दिया जाए। जैसा कि मेरे माननीय मित्र पंडित कुँजरू और अन्य लोग चाहते हैं और उनके स्थान पर अनुच्छेद 175 या 188 या ऐसे कोई अन्य प्रावधान जो इसके बाद सभा पुनः स्थापित करे, जोड़ दिए जाएं। जिसमें राज्यपाल में विवेकाधीन शक्ति यह कहते हुए निहित की जाए कि अनुच्छेद 143 के होते हुए भी राज्यपाल के पास यह या वह शक्ति रहेगी। दूसरा तरीका अनुच्छेद 143 में यह उपबंध करना होगा फ्अनुच्छेदों में उपबंध किए गए या अनुच्छेदों 175, 188, 200 या जहाँ कहीं भी विशेष रूप् से इनका उल्लेख किया गया हो, को छोड़करय् लेकिन, मैं सभा के समक्ष जो बताने की कोशिश कर रहा हूँ वह यह है कि सभा इस बात का उल्लेख करने से नहीं बच सकती कि किसी न किसी तरीके से राज्यपाल के पास विवेकाधीन शक्ति बनी रहेगी।
मेरे माननीय मित्र पंडित कुँजरू और वे सभी लोग जिन्होंने किसी न किसी रूप में यह कहा है कि इन शब्दों को यहां से हटाकर कहीं अन्यत्र स्थानांतरित किया जाए या विशिष्ट अनुच्छेदों के बारे में अनुच्छेद 143 में उल्लेख कर दिया जाना चाहिए, का कुछ हद तक समर्थन किया जा सकता है। मुझे ऐसा लगता है कि यह तो महज प्रारूप तैयार करने का एक तरीका है। इसमें किसी विषय-वस्तु और सिद्धांत का कोई प्रश्न नहीं है। मैं स्वयं ही अनुच्छेद 143 के खण्ड (1) के अन्तिम भाग में संशोधन किए जाने का इच्छुक हूँ यदि मैं इस चरण में यह जान लूँ कि राज्यपाल को विवेकाधीन शक्ति निहित किए जाने के संबंध में संविधान सभा क्या उपबंध करने का प्रस्ताव करती है। मेरी कठिनाई यह है कि अभी हम न तो अनुच्छेद 175 और न ही 188 पर पहुँचे हैं और न ही हमने राज्यपाल को विवेकाधीन शक्ति निहित किए जाने के मामले में किए जा रहे अन्य उपबंधों की सभी सम्भावनाओं पर गौर किया है। यदि मैं यह जानता तो मैं अनुच्छेद 143 में संशोधन करने पर तथा विशेष अनुच्छेद का उल्लेख करने पर सहमत हो जाता लेकिन वैसा अभी नहीं किया जा सकता। इसलिए, मेरा यह कहना है कि यदि अनुच्छेद 143 में ये शब्द बने भी रहे तो इसमें कोई गलती नहीं होगी। वे निश्चित ही असंगत नहीं है।