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माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : मैं नहीं जानता। स्थिति बिल्कुल साफ हैं,
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चाहे राष्ट्रपति को आयकर के बारे में अपनी मर्जी से कोई आवंटन करने के पूर्ण विवेकाधिकार में छोड़ना है या उसे वित्त आयोग की सिफारिशों द्वारा मार्गदर्शित होना चाहिए। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि राष्ट्रपति की स्थिति काफी सुदृढ़ हो जाएगी यदि वह वित्त आयोग द्वारा की गई सिफारिशों को एक न्यायोचित कारण के रूप में निर्दिष्ट करें। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि वित्त आयोग राष्ट्रपति और उन प्रांतों के बीच एक बम्पर का काम कर रहा होगा जो आयकर में से और अधिक राजस्व के लिए हल्ला करें। अतः मैं नहीं समझता कि मेरे मित्र श्री कुंजरू द्वारा प्रस्तावित संशोधन को स्वीकार करने का कोई कारण है।
माननीय सभापति : अब मैं दो संशोधनों को मतदान के लिए रखता हूँ। पहला संशोधन सं. 95 जो डॉ. अम्बेडकर द्वारा प्रस्तावित है।
[ डॉ. अम्बेडकर का संशोधन अंगीकृत हुआ, यथासंशोधित अनुच्छेद 260 संविधान में जोड़ा गया। ]
अनुच्छेद 261
* माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : महोदय, मैं प्रस्तावित करता हूँ :
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“कि अनुच्छेद 261 में, ’संसद’ शब्द के स्थान पर ‘‘संसद का ’प्रत्येक सदन’’’ शब्द रखे जाएँ।“
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** माननीय डॉ बी. आर. अम्बेडकर : माननीय सभापति जी, मुझे खेद है कि मैं इस
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अनुच्छेद के लिए प्रस्तावित संशोधन स्वीकार नहीं कर सकता। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि यह संशोधन अनुच्छेद 261 के उपबंधों को सर्वथा गलत समझने के कारण है। और मैं यह महसूस करता हूँ कि कोई संशोधन आवश्यक नहीं है। अनुच्छेद 261 का अर्थ ठीक से समझने के लिए आपको इससे पूर्व के अनुच्छेदों पर दृष्टिपात करना होगा। वे अनुच्छेद आयकर के वितरण और केन्द्र स्तर पर संगृहीत उत्पाद शुल्क के शुद्ध आगमों के वितरण के विषय में हैं। प्रकटतः, आयकर के वितरण के बारे में अनुच्छेद के अधीन जो हम पारित कर चुके हैं, यह विषय पूर्णतः वित्त आयोग की सिफारिश पर कार्रवाई करने के लिए राष्ट्रपति पर छोड़ दिया गया है। ऐसी स्थिति में, अब संशोधन द्वारा यह कहना संभव नहीं होगा कि जहाँ तक आयकर के वितरण
* ख्., सीएडी, खण्ड IX, दिनांक 10 अगस्त, 1949, पृ. 31, पृष्ठ 5
** ख्., वही, पृष्ठ 228-29