78 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
राष्ट्रपति को अपने विवेकानुसार कार्रवाई करनी चाहिए जिसका अर्थ है......................
पंडित ह्नदयनाथ कुंजरू (संयुक्त प्रांत : साधारण) : क्या माननीय सदस्य मुझे अपने मुद्दे को स्पष्ट करने की अनुमति देने का कष्ट करेंगे क्योंकि मैं यह महसूस करता हूँ कि मैंने जो कुछ कहा है वह उन्होंने पूरी तरह नहीं समझा है? क्या मैं एक दो वाक्य में उसे स्पष्ट कर दूँ कि जो कुछ मैंने कहा था। अनुच्छेद 260 के खंड (3) के अधीन राष्ट्रपति जिस विषय को चाहे, वित्त आयोग को उसकी राय के लिए भेज सकता है। इसलिए मैं राष्ट्रपति को उनकी मर्जी के अनुसार आयोग से परामर्श करने से निषिद्ध करना नहीं चाहता। मैं तो केवल इस बात पर आपत्ति कर रहा हूँ कि राष्ट्रपति के किसी निर्देश के बिना, वित्त आयोग को यह कहने की शक्ति होनी चाहिए कि केन्द्र और प्रांतों के बीच आयकर के शुद्ध आगमों का आवंटन वह नहीं है जो होना चाहिए और यह कि उसके द्वारा सिफारिश किया गया नया प्रतिशत नियत किया जान चाहिए। बस इतना ही कहा था कल मैंने।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : इससे स्थिति और भी विषम हो जाती है,
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क्योंकि मैं यह नहीं समझा सकता कि वित्त आयोग किस प्रकार कोई सिफारिश कर सकता है जब तक कि वह बिंदु उसे खास तौर पर न भेजा जाए या निर्देश के विषयों में सम्मिलित न किया जाए।
पं. ह्नदयनाथ कुंजरू : अनुच्छेद 260 के खंड (3) के उपखंड (क) के अधीन आयोग, अपनी स्वयं की पहल पर उस विषय में सिफारिश कर सकेगा। मेरे मित्र अर्थ समझने के लिए उपखंड को पढ़ लें।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : “राष्ट्रपति द्वारा आयोग को, ठोस वित्त के
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हित में, निर्देशित कोई अन्य विषय“।
पंडित ह्नदयनाथ कुंजरू : यह बात हुई। क्या माननीय सदस्य अनुच्छेद 260 का हवाला देंगे जिस पर हम चर्चा कर रहे हैं खास तौर पर उस खंड के संदर्भ में जिस पर मैंने कल विचार प्रकट किए थे। अनुच्छेद 260 के खंड (3) का उपखंड (क) कहता है -
“आयोग का यह कर्त्तव्य होगा कि वह -
संघ और राज्यों के बीच करों के शुद्ध आगमों के, जो इस अध्याय के अधीन उनमें विभाजित किए जाने हैं या किए जाएं, वितरण के बारे में और राज्यों के बीच ऐसे आगमों के तत्संबंधी भाग के आवंटन के बारे में...........राष्ट्रपति को सिफारिश करे।“
इसी बात पर मेरी आपत्ति है। खंड (3) के उपखंड (घ) के अधीन किसी अन्य विषय को जिसे वह चाहे, वित्त आयोग को निर्देशित करने की राष्ट्रपति की शक्ति में गतिरोध नहीं पडे़गा यदि मेरा संशोधन स्वीकार कर लिया जाता है।