अनुच्छेद 268 - Page 103

82 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

(5) ’राज्य के राजस्व’ शब्दों के स्थान पर राज्य की ‘संचित निधि’ शब्द रखे जाएं।“

यह मात्र परिणामिक है।

माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : महोदय, मैं कोई संशोधन स्वीकार नहीं करता हूँ।

माननीय सभापति : मैं संशोधनों को मतदान के लिए रखता हूँ

[ डॉ. अम्बेडकर का संशोधन अंगीकृत हुआ। प्रो. एस. एल. सक्सेना, एच. वी. कामथ और डॉ. पी. एस. देशमुख द्वारा प्रस्तावित संशोधन अस्वीकार किए गए। यथा संशोधित अनुच्छेद 267 संविधान में जोड़ा गया। ]

अनुच्छेद 268

* माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : महोदय, मेरे मित्र प्रो. के. टी. शाह के अंतिम

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भाषण के सिवाय, जिसमें उन्होंने सुझाव दिया था कि हमें एक खंड समाविष्ट करके ऋण मंजूर करने के संसद के प्राधिकार पर सीमा लगा देनी चाहिए। मैं विसम्मति को समझने में वास्तव में बिल्कुल असमर्थ था जो अनुच्छेद 268 में अन्तर्विष्ट उपबंध के बारे में अन्य वक्ताओं द्वारा व्यक्त की गई थी। यह स्वीकार है कि केवल कार्यपालिका ही उधार लेने के प्रयोजन के लिए देश के क्रेडिट को गिरवी रख सकती है, क्योंकि उधार लेना एक पहलू से कार्यपालक कृत्य है, किन्तु इस अनुच्छेद में यह प्रस्तावित नहीं है कि उधार लेने की कार्यपालिका की शक्ति संसद द्वारा बनाई गई किसी भी विधि द्वारा अप्रतिबंधित रहेगी। यह अनुच्छेद विनिर्दिष्ट तौर पर कहना है कि कार्यपालिका की उधार लेने की शक्ति ऐसी परिसीमाओं के अधीन रहेगी जो संसद विधि द्वारा विहित करे। यदि संसद कोई विधि नहीं बनाती है तो यह निश्चय ही संसद की गलती है और मेरे लिए यह सोचना बहुत मुश्किल है कि कोई भावी संसद इस विषय पर पर्याप्त या गंभीर ध्यान नहीं देगी और कानून नहीं बनाएगी। अनुच्छेद 268 के अधीन मैं यह भी मान लेता हूँ कि संसद द्वारा वार्षिक ऋण अधिनियम बनाया जा सकता है जिसके द्वारा कार्यपालिका की यह शक्ति विहित की जाए या परिसीमित की जाए कि वह उस वर्ष कितना धन उधार ले सकते हैं। अतः मैं यह नहीं समझता कि जो लोग अनुच्छेद 268 के उपबंधों से सहमत नहीं हैं वे और क्या चाहते हैं। निस्संदेह यह एक भिन्न विचारणीय मुद्दा है कि क्या हमारे पास और आगे उपबंध हो जिसके द्वारा देश के क्रेडिट को गिरवी रखने की संसद की शक्ति को परिसीमित किया

* ख्., सीएडी, खण्ड IX, दिनांक 10 अगस्त, 1949, पृ. 339-40