अनुच्छेद 269 - Page 104

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जाए। मुझे ऐसा प्रतीत होता कि इस मुद्दे को भी संसद पर छोड़ दिया जाना चाहिए क्योंकि संसद यह कहने के लिए स्वतंत्र होगी कि उधार देश के कुछ संसाधनों के गिरवी रखकर नहीं लिया जा सकता। मैं नहीं समझता कि इस अनुच्छेद द्वारा संसद इन गारंटियों के बारे में जो संसद द्वारा इन ऋणों पर उधारों की प्रतिभूति स्वरूप दी जाए, अपने आप परिसीमाएं लगाने से किस प्रकार रोक सकता है। अतः मैं सोचता हूँ कि सभी दृष्टिकोणों अनुच्छेद 268 अपने वर्तमान रूप में आकस्मिकताओं पर काम आने के लिए पर्याप्त है और मुझे इस बारे में कोई संदेह नहीं है कि जैसाकि मेरे मित्र श्री अनन्तशयनम अय्यंगर ने कहा था, हमें आशा है, संसद इस मुद्दे को गंभीरता से लेगी और विधियाँ बनाती रहेगी ताकि संघ की उधार लेने की शक्ति परिसीमित रहे, - मैं इससे भी आगे यह कहता हूँ कि मुझे केवल आशा ही नहीं है बल्कि मुझे प्रत्याशा है कि संसद इस अनुच्छेद के अधीन अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन करेगी।

श्री एच. वी. कामथ : क्या डॉ. अम्बेडकर ‘यदि कोई हैं’ शब्दों के विलोप से सहमत नहीं हैं ?

माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : मैं इस पर विचार कर रहा था लेकिन मैं नहीं समझता कि इससे स्थिति में सुधार होगा क्योंकि शब्द “जैसाकि समय-समय पर हो“ हैं।

माननीय सभापति : मैं समझता हूॅ कि ‘भारत की संचित निधि’ शब्दों को प्रतिस्थापित करने वाला संशोधन स्वीकार किया जाता है।

यथा संशोधित अनुच्छेद 268 संविधान में जोड़ा गया।

अनुच्छेद 269

* माननीय सभापति : कुछ संशोधन हैं जो मुद्रित संशोधनों की 2 जिल्दों में पृष्ठ 313 पर मुद्रित हैं।

इसके पश्चात् हम डॉ. अम्बेडकर के संशोधन सं. 107 को लेते हैं।

माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : महोदय, मैं प्रस्तावित करता हूँ-

’कि अनुच्छेद 269 के खंड (1) में’ पहली अनुसूची के भाग 1 में तत्समय विनिर्दिष्ट’ शब्दों और अंकों को हटा दिया जाए।“

कि अनुच्छेद 269 के खण्ड (1) में आए ‘राज्य के राजस्व’ शब्द के स्थान पर ‘राज्य की संचित निधि’ रखा जाए।

* ख्., सीएडी, खण्ड IX, दिनांक 10 अगस्त, 1949, पृ. 340-42