88 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
महोदय, मेरे प्रारूप के संशोधनों के श्री टी. टी. कृष्णमाचारी द्वारा पेश किए जाने के बाद मैं अपनी टिप्पण आरक्षित रखता हूँ और इससे बात पूरी हो जाएगी।
* माननीय सभापति : यदि हम अन्य सभी संशोधनों को लेते हैं तो मेरे विचार में इनका कोई अंत नहीं होगा। पहले, डॉ. अम्बेडकर अपने मन्तव्य की व्याख्या करें और फिर दूसरे संशोधन पेश किए जा सकते हैं।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : माननीय सभापति महोदय, प्रारूप संविधान में
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एक अन्य अनुच्छेद को छोड़कर मैं नहीं समझता, किसी दूसरे अनुच्छेद ने प्रारूपण समिति को इतना सरदर्द दिया है जितना इस अनुच्छेद विशेष ने। मुझे नहीं मालूम कितने प्रारूप तैयार किए गये हैं और कितने अपर्याप्त होने की वजह से नष्ट कर दिए गए हैं क्योंकि उनमें वे मामले समावष्टि नहीं होते थे जो समावष्टि होने आवश्यक एवं वांछनीय थे। मेरे विचार में, प्रारूपण समिति के लिए यह सुखद बात है कि वह अन्ततोगत्वा प्रारूपण पर सहमत हो गई जो मैंने पेश किया है, क्योंकि मैं यह महसूस करता हूँ कि यह वह प्रारूप है जो सबको नहीं तो अधिकांश लोगों को संतोष प्रदान करता है।
एक माननीय सदस्यः प्रश्न,
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : महोदय, यह अनुच्छेद नागरिकता का हवाला
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किसी व्यापक अर्थ में नहीं देता बल्कि इस संविधान के प्रारंभ की तारीख को विद्यमान नागरिकता का हवाला देता है। इस अनुच्छेद का उद्देश्य इस देश के लिए नागरिकता की स्थायी विधि अधिकथित करने का नहीं है। नागरिकता की स्थायी विधि का काम संसद पर छोड़ दिया गया है, और जैसा कि सदस्य अनुच्छेद 6 की भाषा में देखेंगे, जो मैंने प्रस्तावित किया है, नागरिकता संबंधी सम्पूर्ण विषय संसद पर किसी विधि द्वारा जो वह ठीक समझे, अवधारित किये जाने के लिए छोड़ दिया गया है यह अनुच्छेद इस प्रकार है -
‘‘इस भाग के पूर्वगामी उपबंधों की कोई बात नागरिकता के अर्जन और समाप्ति के तथा नागरिकता से संबंधित अन्य सभी विषयों के संबंध में उपबंध करने की संसद की शक्ति का अल्पीकरण नहीं करेगी।“
अनुच्छेद 6 का प्रभाव यह है कि संसद उन लोगों से नागरिकता छीन ही नहीं सकेगी जो अनुच्देद 5 के उपबंधों द्वारा, संविधान के प्रारंभ की तारीख से नागरिक घोषित किए जाते हैं और जो बाद में नागरिक घोषित किए जाते हैं, बल्कि संसद् नये सिद्धांतो को समाविष्ट करते हुए सर्वथा नयी विधि बना सकेगी। जो इन अनुच्छेदों
* ख्., सीएडी, खण्ड IX, दिनांक 10 अगस्त, 1949, पृ. 346-49