भारत सरकार अधिनियम, 1935 (संशोधन विधेयक) की धारा 291 - Page 117

96 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

धारा 291
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भारत सरकार अधिनियम, 1935
(संशोधन विधेयक) की

* माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : माननीय उपसभापति महोदय, अब तक जो

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भाषण मैंने सुने हैं उनसे मैं यह समझा हूँ कि इस बारे में काफी गलतफहमी है कि यह विशिष्ट विधेयक, खासकार इसका खंड 4 क्या प्रस्तावित करता है। मेरे विचार में, शुरू में सदन को यह बताना वांछनीय है कि खंड 4 द्वारा ठीक-ठीक क्या किया जाना अपेक्षित है।

सदन को सही मनःस्थिति में रखने के लिए यदि मैं किसी अपराध के अभिप्राय के बिना ऐसा कह सकता हूँ तो, मैं सदन का ध्यान भारत सरकार अधिनियम की धारा 291 की ओर दिलाना चाहूँगा जिस रूप में यह स्वाधीनता अधिनियम के बाद अनुकूलित किए जाने से पहले प्रवर्तित थी। अब मैं धारा 291 की कुछ पंक्तियाँ पढूंगा।

“जहाँ तक इस अधिनियम द्वारा इसमें इसके पश्चात् वर्णित विषयों के संबंध में उपबंध नहीं किया गया हो वहाँ तक सपरिषद महामहिम सम्राट (और मैं सपरिषद् महामहिम सम्राट पर जोर देना चाहता हूँ) उन विषयों या उनमें से किसी की बावत उपबंध समय-समय पर कर सकेगा आदि आदि।“

सबसे पहली चीज जिस पर मैं सदन का ध्यान आकृष्ट करना चाहूँगा वह यह है कि इस विधेयक के खंड 4 में जो विषय (ख) से (झ) तक दिए गए हैं हूबहू वही हैं जो पुरानी धारा 291 में दिए गए हैं। इसलिए शुरू में यह समझना होगा कि यह

खंड 4 मूल धारा 291 में अन्तर्विष्ट उपबंधों में कोई मूलभूत परिवर्तन नहीं कर रहा है इस विधेयक में सम्मिलित जिन विषयों के लिए नई धारा 291 के उपबंधों द्वारा गर्वनर जनरल को शक्तियां दी जा रही हैं वे वही है जो सपरिषद महामहिम सग्राट को मूल धारा 291 द्वारा दी गई थीं (एक माननीय सदस्य : नहीं )। आशा है, यह बात अब हरेक को स्पष्ट हो गई होगी और मैं नहीं समझता कि इस पर कोई संदेह हो सकता है, क्योंकि जो कोई इस विधेयक के विभिन्न खंडों और पुरानी धारा 291 की तुलना करेगा उसकी सब आशंकाएँ दूर हो जाएंगी।

* ख्., सीएडी, खण्ड IX, दिनांक 18 अगस्त, 1949, पृ. 465-68