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इसलिए यह सवाल पूछा जा सकता है कि ऐसा क्यों है कि अब हम गर्वनर जनरल को शक्ति दे रहे हैं। यदि मैं कह सकता हूँ तो, कठिनाई यह है। जो भी हो, जब भारत सरकार अधिनियम, 1935 को स्वाधीनता अधिनियम के पश्चात् अनुकूलित किया गया तो मेरे निर्णय में एक चूक हो गई और वह चूक यह थी कि यह शक्ति जो मूलतः सपरिषद महामहिम सम्राट में निहित थी, तार्किक दृष्टि से, गर्वनर जनरल को अंतरित होनी चाहिए थी क्योंकि डोमिनियम कानून के अधीन गवर्नर जनरल सपरिषद् महामहिम सम्राट के स्थान पर पदासीन था। लेकिन दुर्भाग्यवश, जैसा कि मैंने कहाः यह कि धारा 291 को अनुकूलित करते समय जो शक्ति अब हम गवर्नर जनरल को दे रहे हैं वह स्थानीय विधानमंडल को दे दी गई। मैं अनुकूलित धारा 291 को पढूंगा। मैं अपने उन मित्रों से जो इसपर उद्वेलित हो रहे हैं इस अनुकूलित धारा को पढ़ने के लिए कहूँगा। यह धारा निम्नलिखित है -
“जहाँ तक इस अधिनियम में वर्णित विषयों से संबंधित उपबंध किसी प्रांतीय विधानमंडल के विषय में नहीं किया गया है वहाँ तक उन विषयों या उनमें से किसी के संबंध में उपबंध विधानमंडल के अधिनियम द्वारा किया जा सकेगा आदि आदि“।
अब यह पता चल चुका है कि वास्तव में एक त्रुटि हो गई थी जब उस प्रक्रम पर धारा अनूकूलित की गई थी तो गवर्नर जनरल को वे शक्तियाँ दी जानी चाहिए थी, क्योंकि धारा 291 के अधीन वे शक्तियां सपरिषद महामहिम सम्राट में निहित थीं, स्थानीय विधानमंडल में नहीं। इस विधेयक द्वारा हम केवल इतना कर रहे हैं कि हम इसे उसी रूप में पुनःस्थापित कर रहे हैं जिस रूप में यह अनुकूलित धारा 291 में विधमान थी। अतः मैं यह यह निवेदन करना चाहता हूँ कि सभा के किसी भी सदस्य द्वारा की गई यह आलोचना नितांत अनपेक्षित है कि यह एक प्रकार की गहरी चाल है ताकि राजनीतिक हेतू के लिए संविधान को अस्थिर किया जा सके। हम यहाँ केवल उस चूक का सुधार कर रहे हैं जो उस समय हो गई थी।
अब मैं अगले मुद्दे पर आता हूँ अर्थात् ‘‘विधानमंडल के सदन या सदनों की संरचना“ शब्दों को जोड़ने पर आता हूँ। मैं पूरी तरह सहमत हूँ......
डॉ. पी. एस देशमुख : क्या मैं एक सवाल पूछ सकता हूँ महोदय? क्या शब्दों
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का परिवर्तन “जहाँ तक इसमें इसके पश्चात् वर्णित विषयों इस अधिनियम द्वारा नहीं बनाया जाता’’ इन शब्दों का लोप और इन उपबंधों का लागू करना * .........
* ख्., बिंदिंयों से व्यवधान इंगित होता है।