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है। हर रोज प्रारूपण समिति सर्वव्यापी स्वरूप के नये-नये संशोधन भेज रही है। वे अकस्मात हवाई हमले की भांति आते हैं।
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प्रश्न?
माननीय उपसभापति : क्या मैं माननीय सदस्य को याद दिलाऊं कि यह संशोधन सदन के समक्ष डॉ. अम्बेडकर और प्रारूपण समिति द्वारा सदन में सार्वजनिक रूप से व्यक्त की गई इच्छा के जवाब में लाया गया है। इस कारण मैं इस व्यवस्था के सवाल को नामंजूर करता हूँ। अब मैं डॉ. अम्बेडकर से कहता हूँ कि वे अपना संशोधन प्रस्तावित करें।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : माननीय उपसभापति महोदय, मैं प्रस्तावित करता हूँ :
“कि अनुच्छेद 150 के स्थान पर निम्नलिखित अनुच्छेद रखा जाएः
(1) विधान परिषद वाले राज्य की विधान परिषद के सदस्यों की कुल संख्या उस राज्य की विधान सभा के सदस्यों की कुल संख्या के चौथाई) से अधिक नहीं होगी :
| fo | èkku |
|---|
| aj | puk |
|---|
“विधान परिषदों की
परंतु किसी राज्य की विधानपरिषद के सदस्यों की कुल संख्या किसी भी दशा में चालीस से कम नहीं होगी।
(2) जब तक संसद विधि द्वारा अन्यथा उपबंध न करे तब तक किसी राज्य की विधान परिषद की संरचना खंड (3) में उपबंधित रीति से होगी।
(3) किसी राज्य की विधान परिषद के सदस्यों की कुल संख्या का -
(क) लगभग एक-तिहाई भाग, उस राज्य की नगरपालिकाओं, जिला बोर्डों
और अन्य ऐसे स्थानीय प्राधिकारियों जो संसद विधि द्वारा विनिर्दिष्ट करे,
सदस्यों, से मिलकर बनने वाले निर्वाचक-मंडलों द्वारा निर्वाचित होगा;
(ख) लगभग बारहवां भाग उस राज्य में निवास करने वाले ऐसे व्यक्तियों से
मिलकर बनने वाले निर्वाचक-मंडलों द्वारा निर्वाचित होगा, जो भारत के
राज्यक्षेत्र में किसी विश्वविद्यालय के कम से कम तीन वर्षीय स्नातक हों
या जिनके पास कम से कम तीन वर्ष की ऐसी अर्हताएं हो जो संसद
द्वारा बनाई गई किसी विधि या उसके अधीन ऐसे किसी विश्वविद्यालय
के स्नातक की अर्हताओं के समतुल्य विहित की गई हों;