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कि संसद इस नये अनुच्छेद 150 में अधिकथित संरचना को किसी भी समय विधि द्वारा बदल सकेगी। आशा है यह समझौता सदन को स्वीकार्य होगा और सदन इस संशोधन को स्वीकार करने की स्थिति में होगा।
* माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : माननीय उपसभापति महोदय, जो संशोधन
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प्रस्तावित किए गए हैं उनमें से मैं श्री सरवटे द्वारा प्रस्तावित संशोधनों को स्वीकार करने के लिए तैयार हूँ। मेरे विचार में, उन्होंने वर्तमान प्रारूप में वास्तविक कठिनाई को पकड़ा है। प्रारूप का कहना है : ’राज्य में विश्वविद्यालय’। बहुत स्पष्ट है कि ऐसे अनेक प्रांत हैं जिनमें वर्तमान में कोई विश्वविद्यालय नहीं है। लेकिन फिर भी दूसरे विश्वविद्यालयों के स्नातक हैं जो उस राज्य में रहते हैं। निश्चित रूप से आशय यह नहीं है कि जो स्नातक राज्य में रहते हैं उनसे उच्च सदन के निर्वचन में भाग लेने का अधिकार मात्र इसलिए छीन लिया जाए कि वह उस राज्य विशेष में विश्वविद्यालय का स्नातक नहीं है। अतः उस राज्य विशेष में रहने वाले स्नातकों के लिए मार्ग साफ करने के लिए मेरे विचार में यह संशोधन आवश्यक है और इसे स्वीकार करने के लिए प्रस्तावित करता हूँ। मेरा केवल यह कहना है कि ’अभ्यासतः’ शब्द कदाचित आवश्यक नहीं है क्योंकि अर्हता के रूप में निवास स्थान अनुच्छेद 149 के उपबंधों में परिभाषित किया जाएगा। जिसमें हमारे पास अर्हताओं और निरर्हताओं को परिभाषित करने की शक्ति है।
जहाँ तक आलोचनाओं के अन्य बिंदुओं का संबंध है, मुझे नहीं मालूम कि जो सदस्य इस विशिष्ट अनुच्छेद की निंदा करते समय पांडित्यपूर्ण पदावली में उलझे रहे हैं, उन्होंने अपनी या इस सदन की कोई सेवा की है। इस विषय पर एकाधिक बार बहस हो चुकी है। प्रांत में उच्च सदन होना चाहिए या नहीं यह एक ऐसा विषय है जिस पर बहस हुई थी और यह प्रस्ताव स्वीकार किया गया था कि जो प्रांत दूसरा सदन चाहते हैं, उन्हें उसे रखने की अनुमति दी जानी चाहिए। मैं नहीं समझता कि उन्हीं तर्कों को दोहराने से कोई अच्छा प्रयोजन सिद्ध होगा। जो उन सदस्यों द्वारा तब पेश किए गए थे जब इस विषय पर बहस हुई थी।
सदन के पटल पर रखे गए सिद्धांत की गुणत्ता के संबंध में, मुझे किसी भी सदस्य की ओर से जिसने इस बहस में भाग लिया है एक भी रचनात्मक सुझाव नहीं दिखाई दिया कि दूसरे सदन का आनुकल्पिक गठन क्या होना चाहिए। यहाँ-वहाँ तर्क दिए गए हैं और यह बताने के लिए निंदा की गई है कि यह उपयोगी उपबंध है अथवा खतरनाक उपबंध है। ठीक है मैं यह कहने को तैयार हूँ कि यह ऐसा विषय
* ख्., सीएडी, खण्ड IX, दिनांक 19 अगस्त, 1949, पृ. 490-91