भारत सरकार अधिनियम, 1935 (संशोधन विधेयक) की धारा 291 - Page 125

104 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

है जिसपर दो मत हो सकते हैं और मैं यह कहने को तैयार नहीं हूँ कि मेरा मत या प्रारूपण समिति की राय ही इस मामले में सही राय है। हमें किसी तरह का गठन तो उपबंधित करना होगा और मैं यह कहने को तैयार हूँ कि उपबंधित गठन वैया युक्तियुक्त एवं व्यवहार्य है जो वर्तमान परिस्थितियों में सोचा जा सकता है।

इसके बाद दो मुद्दे आते हैं - एक मेरे मित्र श्री नागप्पा द्वारा उठाया गया था। वे चाहते थे कि खेतिहर मजदूर के प्रतिनिधित्व के लिए उपबंध किया जाना चाहिए। मैं नहीं समझता कि उच्च सदन में खेतिहर मजदूर के प्रतिनिधित्व के लिए ऐसा कोई उपबंध आवश्यक है, क्योंकि मेरी राय में अवर सदन में खेतिहर मजदूरों का बहुत बड़ा प्रतिनिधित्व इस दृष्टि से होगा कि वह मताधिकार जिस पर अवर सदन निबंधित होगा प्रौढ़ मताधिकार होगा और मैं नहीं समझता कि.....

श्री एस. नागप्पा : यदि ऐसी स्थिति है तो अन्य सब वर्गों को भी जिन्हें आप दे रहे हैं अवर सदन में प्रतिनिधित्व मिलेगा।

माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : उनका उपबंध बिल्कुल भिन्न कारणों से किया

v kj
vE csMd j

गया है; लेकिन खेतिहर मजदूरों के लिए अवर सदन में काफी प्रतिनिधित्व होगा।

मेरे मित्र श्री मणिस्वामी पिल्लै ने एक संशोधन के द्वारा यह सवाल उठाया कि उच्च सदन में अनुसूचित जातियों के लिए विशेष प्रतिनिधित्व होना चाहिए। अब मैं उन्हें यह बताना चाहता हूँ कि जहाँ तक प्रारूपण समिति का संबंध है इस पर सलाहकार समिति की रिपोर्ट लागू होती है जिसने इस विचार पर कार्यवाही की थी। सलाहकार समिति की रिपोर्ट में, जो अगस्त 1947 के दौरान सदन के समक्ष रखी गई थी, निम्नलिखित उपबंध दिया हुआ है :

“(ग) केन्द्रीय और प्रांतीय विधानमंडलों के अवर सदन में मुसलमानों के लिए उनकी जनसंख्या के आधार पर सीटों का आरक्षण होगा।“

“3.(क) अनुसूचित जातियों के नाम से निर्दिष्ट और भारत सरकार अधिनियम, 1935 की अनुसूचियों में परिभाषित हिन्दू समाज के वर्ग को वही अधिकार और सुविधाएं होंगी जो इसमें उपबंधित हैं आदि, आदि“। इसका अर्थ यह है कि अनुसूचित जातियों को प्रत्याभूत प्रतिनिधित्व केन्द्रीय और प्रांतीय विधानमंडलों के अवर सदनों में ही प्रत्याभूत होगा। यह फैसला संविधान सभा का है। अतः मैं नहीं समझता कि प्रारूपण समिति ऐसे किसी प्रतिपाद को अपनाने में सक्षम नहीं है, क्योंकि मैं किसी की भावना को ठेस पहुंचाना नहीं चाहता। यदि कोई इस फैसले के प्रबल रूप से पक्ष में है तो वे मेरे मित्र श्री मणिस्वामी पिल्लै हैं और मैं समझता हूँ कि वे उस बात से संतुष्ट होने चाहिए जो कुछ उन्होंने तब तक पालन करने की सहमति दी थी।