110 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
सरकार अधिनियम, 1935 के अधीन प्रांतों का पूरा हिस्सा उन्हें एक निश्चित कालावधि के भीतर अंतरित किया जाना परिकल्पित था और यदि आपातकाल हो तो गवर्नर जनरल को प्रांतों को उनका हिस्सा अंतरित करने में विलम्ब करना और इस प्रकार उस कुल कालावधि को लम्बा खींचने की अनुमति थी, जिसमें प्रांतों को उनका पूरा हिस्सा मिल जाए। यही एकमात्र कारण था; मेरे मित्र द्वारा निकाला गया निष्कर्ष पूरी तरह औचित्यहीन है।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : मुझे पटल पर रखे गए संशोधन से सर्वाधिक
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सहज निष्कर्ष निकालने का हक है।
पंडित हृदयनाथ कुंजरू : माननीय सदस्य मुझे पूरी तरह गलत समझ रहे हैं। मेरे संशोधन के अंतर्गत राष्ट्रपति को संघीय उत्पाद शुल्क के आगमों के वितरण को परिवर्तित करने की कोई शक्ति नहीं होगी।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : मुझे अफसोस है कि माननीय सदस्य ने
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विषय को अपने संशोधन में स्पष्ट नहीं किया है और यदि अब वह एक नया अर्थ देना चाहते हैं तथा मूलभूत परिवर्तन करना चाहते हैं तो संशोधन ऐसा होना चाहिए था जिससे मुझे उनके आशय की पूरी जानकारी मिल जाती। संशोधन में ऐसा कोई सुझाव नहीं है जिससे पता चले कि माननीय सदस्य अनुच्छेद 253 और 255 के उपबंधों को परिवर्तित करना चाहते हैं। यह बाद में सोचा गया हो सकता है लेकिन मैं बाद में सोची गई बात पर कार्यवाही नहीं कर सकता। मुझे तो पटल पर रखे गये संशोधन पर ही कार्यवाही करनी है। अतः जैसे मैंने संशोधन को पढ़ा, मेरा अर्थान्वयन बहुत सहज है।
पंडित हृदयनाथ कुंजरू : माननीय सदस्य पूर्णरूपेण अन्यायोचित है।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : यह माननीय सदस्य का मत है। मेरा पठन
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है कि अब कुछ नई वस्तु पेश की जा रही है।
पंडित हृदयनाथ कुंजरू : माननीय सदस्य मुझे गलत समझ रहे हैं और वे जानते हैं कि वे ऐसा कर रहे हैं।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : माननीय सदस्य अपने विचारों को भी गलत
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व्यक्त कर रहे हैं। इसलिए, जैसा मैं समझता हूँ मेरे माननीय सदस्य का उत्पाद शुल्क एवं अनुदान की प्राप्तियों को बदलने की पद्धति में परिवर्तन का सुझाव देने का प्रश्न नहीं है। केवल प्रश्न जिसे उन्होंने उठाया है आपातकाल में आयकर आवंटन के बदलने का है। इस पर भी मुझे क्या प्रतीत होता है? यदि मैं उनके संशोधन को दुबारा सही ढंग से पढूं तो वे आयकर वितरण में राष्ट्रपति को दी गई परिवर्तन संबंधी स्वेच्छा