111
निर्णय को सम्पूर्ण रूप से छीन नहीं रहे हैं। वे जो कुछ कर रहे हैं वह यह है कि यदि राष्ट्रपति पिछले आदेश में दी गई आयकर की प्राप्ति को बदलता है, तो राष्ट्रपति को उस प्रकार से कार्य करना चाहिए जो इनके संशोधन में बताया गया है। दूसरे शब्दों में, मेरे द्वारा रखे गये मसौदा खण्ड व मेरे मित्र पंडित हृदयनाथ कुंजरू के संशोधन में मात्र यह अन्तर है कि जहाँ तक राष्ट्रपति के स्वेच्छानिर्णय का प्रश्न है, वह नियमित न रहे, वह इस प्रकार से विनियमित रहे जिस प्रकार इन्होंने सुझाया है।
इस पर मेरा उत्तर है : विश्वास करने का कारण कहाँ है कि आयकर के बंटवारे से संबंधित प्रावधानों को बदलने के लिए सुधार एवं शक्तियों का प्रयोग करने में राश्ट्रपति मनमाने तरीके से कार्य करते हुए आयकर प्राप्ति को पूर्णतः समाप्त कर देंगे। यह विश्वास करने के लिए आधार कहाँ है कि राष्ट्रपति मेरे माननीय मित्र पंडित हृदयनाथ कुंजरू के द्वारा अपने संशोधन में रखे गये सुझाव को अंगीकर नहीं करेंगे? यह मानने का यहाँ कोई कारण अथवा इस प्रकार का मनमाना सुझाव देने का कोई कारण नहीं है कि राष्ट्रपति बंटवारे में राज्यों को प्राप्त होने वाली राशि को, पूर्णतः समाप्त करने जा रहे हैं, जिसके वे हकदार हैं। आखिरकार राष्ट्रपति भी एक तर्क-संगत व्यक्ति होंगे, वे समझ लेंगे कि किस हद तक आयकर की प्राप्ति भी प्रदेश की राजस्व की आय का एक भाग है और वे यह भी जानेंगे कि आपातकाल होते हुए भी जितनी सहायता केन्द्र की करना आवश्यक है, राज्य को चलाने के लिए भी उतनी ही सहायता करना आवश्यक है।
इसलिए मेरे विचार में, राष्ट्रपति के हाथ इस प्रकार बांधना आवश्यक नहीं है जिस रीति से मेरे मित्र पंडित हृदयनाथ कुंजरू के संशोधन ने सुझाये हैं। होना यह चाहिए कि राष्ट्रपति राज्य अथवा वित्त आयोग अथवा किसी अन्य विषेशज्ञ अधिकारी की सलाह से आपातकाल में आयकर की प्राप्ति के वितरण से निपटने के लिए कुछ दूसरे तरीके निकालें और सुझाव जो उस समय हो वे मेरे मित्र पंडित हृदयनाथ कुंजरू द्वारा रखे गये सुझावों से अच्छे सिद्ध हों। इसलिए मैं सोचता हूँ कि राष्ट्रपति को किसी खास प्रकार से कार्य करने के लिए बांधना बहुत गलत होगा और उसे स्वतंत्र अथवा स्वेच्छा से बहुत से अन्य तरीकों से कार्य करने के लिए भी नहीं छोड़ना चाहिए। मेरा सुझाव है कि मसौदे को लचीला छोड़ देना ही अच्छा होगा जैसा कि प्रारूपण समिति ने करने के लिए प्रस्तावित किया है, मेरे मित्र पंडित हृदयनाथ कुंजरू के संशोधन को स्वीकार करने का कोई लाभ नहीं होगा।
जैसा मैंने कहा था, मैंने मूल मसौदे में संशोधन किया है जिससे सम्पूर्ण मामले को पूर्णतः राष्ट्रपति की स्वेच्छा पर छोड़ दिया गया है और इस विषय में संसद का कोई दखल नहीं होगा। नये संशोधन द्वारा मैंने प्रस्ताव किया है कि राजस्व के