अनुच्छेद 280 - Page 133

112 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

बंटवारे से संबंधित राष्ट्रपति के किसी भी आदेश पर विचार करना संसद के लिए संभव होगा और इसीलिए यदि राष्ट्रपति कोई ऐसा कार्य कर रहा है जो राज्य के हक में घातक अथवा हानिकारक है, तो निश्चय ही बहुत से प्रतिनिधि संसद में जो उन राज्यों से आये होंगे और जो निस्संकोच राज्य के लाभ को भूले नहीं होंगे, वे सब ठीक कर लेंगे। इसलिए मैं सोचता हूँ कि इन तथ्यों के कारण मूल व्यवस्था को जारी रखा जाय क्योंकि यह अपेक्षाकृत उससे बहुत लचीला है जो मेरे मित्र पंडित हृदयनाथ कुंजरू ने सुझाया है।

[ डॉ. अम्बेडकर का संशोधन स्वीकार किया गया और पंडित हृदयनाथ कुंजरू का अस्वीकार किया गया। अनुच्छेद 277 संशोधित रूप में संविधान में जोड़ा गया। ]

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अनुच्छेद 280

“कि अनुच्छेद 280 के स्थान पर निम्नलिखित अनुच्छेद रखा जाये : आपातकाल में अनुच्छेद 25 द्वारा प्रत्याभूत अधिकारों का निलम्बन 280, (1) जहाँ आपात की उद्घोषणा प्रवर्तन में है वहाँ राष्ट्रपति अधिकारों के निलम्बन आदेश द्वारा घोषित कर सकेगा कि भाग 3 द्वारा प्रदत्त अधिकारों में से ऐसे अधिकार जो इस आदेश में वर्णित हैं, प्रवर्तित कराने के लिए किसी 25 द्वारा प्रत्याभूत अधिकारों का निलम्बन

न्यायालय में समावेदन करने का अधिकार तथा इस प्रकार वर्णित अधिकारों को प्रवर्तित कराने के लिए किसी न्यायालय में लम्बित सब कार्यवाहियां उस कालावधि के लिए जिसमें कि उद्घोषणा लागू रहती है अथवा उससे छोटी ऐसी कालावधि के लिए जो आदेश में उल्लिखित की जाए, निलम्बित रहेंगे/रहेंगी।

(2) उपरोक्त प्रकार किया हुआ आदेश भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में अथवा उसके किसी भाग पर विस्तारित हो सकेगा।

(3) खण्ड (1) के अधीन किया प्रत्येक आदेश, उसके किए जाने के पश्चात् यथासंभव शीघ्र, संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा।“

श्रीमन्, सदन महसूस करेगा कि खण्ड (2) और (3) पुराने अनुवाद में जोड़े गए हैं। पुराने अनुच्छेद में एक उपबंध था कि जब आयात की उद्घोषणा प्रवृत्त हो तो राष्ट्रपति सम्पूर्ण भारत में भाग III में अंकित प्रदत्त अधिकारों के उपबंधों को निलम्बित कर सकेगा। अब यह अभिनिर्धारित किया जाता है कि इस तथ्य के बावजूद कि

* ख्., सीएडी, खण्ड IX, दिनांक 19 अगस्त, 1949, पृ. 523