अनुच्छेद 280 - Page 134

113

आपात है भाग III द्वारा दिये गये अधिकारों का प्रवर्तन कुछ क्षेत्रों में बनाये रखना बहुत संभव है और मात्र घोषणा के कारण सम्पूर्ण भारत में अधिकारों का सार्वजनिक निलम्बन आवश्यक नहीं है। परिणामस्वरूप, यह उपबंध करने के लिए प्रारूप अनुच्छेद में खण्ड (2) रखा गया है।

तीसरे, खण्ड (1) के अधीन जारी किये गये किसी आदेश के विषय में मूल अनुच्छेद में संसद को कुछ कहने की अनुज्ञा देने का कोई उपबंध नहीं था। यह सदन की इच्छा थी कि निलम्बन का आदेश पूर्णरूप से बिना बन्धन के राष्ट्रपति के हाथ में न छोड़ा जाये और परिणामस्वरूप अब यह व्यवस्था की गई है कि इस प्रकार का आदेश संसद के सामने लाया जाये, निःसंदेह इस पारिणामिक उपबंध के साथ कि संसद अपनी इच्छानुसार कार्यवाही करने के लिए स्वतंत्र रहेगी।

* * * *

* माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : श्रीमन्, मेरे द्वारा लाए गए खंड में अंतर्विष्ट

kku u h;
v kj
vE cMs d j

उपबंध के विरुद्ध इस अनुच्छेद पर बहस में भाग लेने वाले वक्ताओं द्वारा व्यक्त प्रबल भावनाओं से मैं बिल्कुल भी चकित नहीं हूँ। अनुच्छेद मूल विषयों और जनता के अधिकारों विषयक महत्वपूर्ण विषयों के बारे में है इसलिए यह उचित है कि हम इस प्रकार के विषय पर न केवल सावधानी से विचार करें अपितु, मैं यह कहने के लिए भी तैयार हूँ कि कुछ भावनाओं से विचार करें। हम कुछ मूल अधिकार पहले ही पारित कर चुके हैं और जब हम उन्हें कुछ कम करने की अथवा उन्हें कुछ समय के लिए निलम्बित करने की कोशिश कर रहे हैं तो उन्हें कम करने अथवा थोड़े समय के लिए निलम्बित करने के लिए अपनाये गये तरीकों में बहुत सावधान रहना चाहिए।

इसलिए मेरे जिन मित्रों ने उस अनुच्छेद के विरुद्ध बोला है, मैं आशा करता हूँ, वे समझेंगे कि मैं किसी भी तरह उनके कथन के विरुद्ध नहीं हूँ। वास्तव में मैं उनकी भावनाओं की कद्र करता हूँ। मैं अफसोस से कहता हूँ कि इनमें से किसी भी संशोधन को स्वीकार करना मेरे लिए संभव नहीं है जो उन्होंने पेश किए हैं अथवा जो सुझाव दिये हैं। यदि मैं ऐसा कह सकता हूँ तो मैं बिल्कुल भी आश्वस्त नहीं हूँ। साथ ही मुझे यह भी कहना चाहिए कि मूल अधिकारों के लिए मैं उनसे कम उत्साहित नहीं हूँ।

अपने उत्तर के समय मैं कुछ सामान्य प्रश्नों को लेना चाहता हूँ। मेरे लिए वास्तव में यह संभव नहीं है कि मैं उन सभी बिन्दुओं पर विस्तार से विचार करूं जिनके लिए बहुत से वक्ताओं ने जोर दिया है। पहला प्रश्न है क्या आपातकाल में मूल अधिकार

* ख्., सीएडी, खण्ड IX, दिनांक 20 अगस्त, 1949, पृ. 548-51