117
प्रयोग भाग III में हुआ है, जहाँ इसका अर्थ दोनों केन्द्र, राज्यों और यहाँ तक कि नगरपालिका भी है।
पिंंडत ठाकुरदास भार्गव : जबकि अनुच्छेद 277(1) में केवल संसद का हवाला दिया गया है।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : मैं यही तो कहता हूँ 279 भी अनुच्छेद 8 से
| ku | u | h; |
|---|
| EcsM | dj |
|---|
शासित होगा। इसलिए कोई कानून जो प्रदत्त मूल अधिकारों से असंगत है प्रवृत्त नहीं रहेगा।
अब मैं पंडित भार्गव के संशोधन 78 पर आता हूँ। इस संशोधन में उन्होंने कहा है कि इन मूल अधिकारों में से किसी को निलम्बित करते हुए राष्ट्रपति द्वारा जारी किया गया आदेश अभिव्यक्ततः अनुसमर्थित होगा। वे कहते हैं कि राष्ट्रपति द्वारा जारी किये गये आदेश का संसद द्वारा अभिव्यक्त अनुसमर्थन होना चिहए। प्रारूपण समिति द्वारा प्रस्तावित प्रारूप अनुच्छेद उपबंध करता है कि अनुसमर्थन मान लेना चाहिए जब तक कि सार्थक कार्यवाही के द्वारा संसद राष्ट्रपति द्वारा जारी आदेश को समाप्त नहीं कर देती। मेरे द्वारा बन गए अनुच्छेद और उनके संशोधन में यही वास्तविक अन्तर है।
पंडित ठाकुरदास भार्गव : लेकिन यह बहुत मूलभूत अन्तर है।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : यह बहुत मौलिक चीज है। एक अर्थ में यह
| ku | u | h; |
|---|
| EcsMd | j |
|---|
मौलिक है और एक अर्थ में यह मौलिक नहीं है क्योंकि हमने व्यवस्था की है कि उद्घोषणा संसद के सामने रखी जाएगी। मैंने वह बंधन अब थोप दिया है। यदि संसद बुलाई जाती है और उद्घोषणा उसके सामने रखी जाती है तो यह एक मूर्खता होगी, यदि वे व्यक्ति जो संसद में आते हैं, सकारात्मक कार्यवाही नहीं करते और इस प्रकार की संसद एक अनावश्यक वस्तु होगी और उसकी आवश्यकता नहीं है।
पंडित ठाकुरदास भार्गव : क्या यह कहना आवश्यक नहीं है कि कानून केवल आपातकाल में लागू रहेगा और उद्घोषणा के पश्चात् उससे कम समय अथवा छः माह के लिए नहीं?
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : मैं उस पर आ रहा हूँ लेकिन जहाँ तक इस
| ku | u | h; |
|---|
| EcsMd | j |
|---|
प्रश्न का संबंध है, यह केवल विस्तार का विषय है कि क्या संसद एक अभिव्यक्त संकल्प द्वारा कहे कि हम चाहते हैं कि राष्ट्रपति उसे वापस लें अथवा हम चाहते हैं कि राष्ट्रपति उसे जारी रखें अथवा हम चाहते हैं कि राष्ट्रपति उसे बदली शक्ल में जारी रखें। एक बार संसद बुला ली जाये और विषय संसद के समक्ष आ जाए तो यह उचित नहीं होगा कि वह विषय संसद पर छोड़ दिया जाये और जब तक