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अनुच्छेद 285
श्री नजीरुद्दीन अहमद : मैं सोचता हूँ कि किसी के लिए भी इन बदलावों को समझने की कोशिश करना कठिन है। इसलिए मैं नियम भंग होने के आधार पर ही नहीं बल्कि इस आधार पर भी आपत्ति करता हूँ कि वे आसानी से समझे जाने की शक्ल में नहीं हैं और वे स्वयं संविधान संशोधन के रूप में व्यक्त होने चाहिएं।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : यह पहला समय नहीं है जब मेरे मित्र ने
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व्यवस्था का बिंदु उठाया है। क्या अच्छा होता कि आपने प्रारूपण समिति को प्रक्रिया नियमों की बारीकियों से दूर जाने की अनुमति दी होती और इसलिए मैं निवेदन करता हूँ कि इस मामले में भी आप हमें आगे बढ़ने दें।
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* माननीय सभापति : डॉ. अम्बेडकर स्पष्ट कर सकते हैं कि पृथक अनुच्छेद किस प्रकार अस्तित्व में आए। आप उन्हें एक साथ पेश करें और हम उन्हें मत के समय पृथक-पृथक लें।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : हाँ, उन्हें पृथक ही रखा जाय।
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श्रीमन्, मेरा प्रस्ताव है :
“कि अनुच्छेद 285 के स्थान पर निम्नलिखित रखा जाए :
- (1) लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति, यदि वह संघ आयोग या संयुक्त आयोग है तो, राष्ट्रपति द्वारा तथा यदि वह राज्य आयोग है तो, राज्य के राज्यपाल या राज प्रमुख द्वारा की जाएगी :
सदस्यों की नियुक्ति
तथा पदावधि
परन्तु, प्रत्येक लोक सेवा आयोग के सदस्यों में से यथासंभव निकटतम आधे ऐसे व्यक्ति होंगे जो अपनी-अपनी नियुक्तियों की तारीख पर भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार के अधीन कम से कम दस वर्ष तक पद धारण कर चुके हों तथा उक्त दस वर्ष की कालावधि की संगणना में ऐसी कालावधि भी सम्मिलित होगी, जिसमें इस संविधान के प्रारंभ से पूर्व किसी व्यक्ति ने भारत के सम्राट के अधीन या देशी राज्य के अधीन पद धारण किए हैं।
* ख्., सीएडी, खंड IX, दिनांक 22 अगस्त, 1949, पृ. 573-576