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और फेडरल न्यायालय के न्यायाधीशों के बारे में प्रिवी कौंसिल द्वारा की जाती है और यह सूचना होने पर कि यह दुर्व्यवहार का मामला है, गवर्नर जनरल फेडरल न्यायालय न्यायाधीश अथवा उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटा सकता है जहाँ कहीं भी दुर्व्यवहार का मामला हो, लोक सेवा आयोग को हटाने के बारे में हमने उन्हीं उपबंधों को अपना लिया है।
स्वतः निर्योग्यता के बारे में, मैं नहीं सोचता कि किसी प्रकार का मतभेद हो सकता है क्योंकि यह स्पष्ट है कि यदि लोक सेवा आयोग का कोई सदस्य दिवालिया हो गया है तो उसकी निष्ठा पर सर्वथा भरोसा नहीं किया जा सकता और इसीलिए इसे स्वतः निर्योग्यता के रूप में काम करना चाहिए। इसी प्रकार, यदि लोक सेवा आयोग का कोई सदस्य जो निःसंदेह राज्य का पूर्णकालीन अधिकारी है, अपनी पूरी शक्ति से यथासंभव कर्त्तव्य निर्वहन करने और अपना संपूर्ण समय काम में लगाने के स्थान पर किसी अन्य स्थान पर कुछ कार्य करता है तो यह स्वतः निर्योग्यता का आधार होना चाहिए। इसी प्रकार, तीसरी निर्योग्यता अर्थात् वह दिमाग व शरीर से दुर्बल हो गया है यह भी बिना किसी झगड़े के स्वतः निर्योग्यता का उपयुक्त मामला समझा जाए। सदन के सदस्यों को यह भी याद होगा कि अनुच्छेद 285क में उच्चतम न्यायालय द्वारा की जा रही जांच के समय लोक सेवा आयोग के सदस्य को निलम्बित करने का उपबंध था। मैं सोचता हूँ कि उपबंध आवश्यक है। यदि राष्ट्रपति का विचार है कि सदस्य कदाचार का दोषी है तो यह वांछनीय नहीं है कि सदस्य जब तक उसका चरित्र उच्चतम न्यायालय की रिपोर्ट के द्वारा निर्मल घोषित नहीं किया जाता, वह लोक सेवा आयोग के सदस्य की हैसियत से कार्य करता रहे।
अब, मैं संघ और राज्य दोनों के लोक सेवा आयोगों के सदस्यों के नौकरी संबंधी महत्वपूर्ण मामलों अथवा नौकरी की योग्यता पर आता हूँ। सदस्य देखेंगे कि हमने अनुच्छेद 285 खण्ड (3) के अनुसार दोनों अध्यक्ष और सदस्य केन्द्रीय लोक सेवा आयोग तथा राज्य आयोग के अध्यक्ष और राज्य आयोग के सदस्यों को उसी पद पर दुबारा नियुक्ति के अयोग्य बनाया है, ऐसा कहिए कि जब अध्यक्ष और सदस्य की कालावधि एक बार समाप्त हो जाती है चाहे वह अध्यक्ष संघ लोक सेवा आयोग अथवा अध्यक्ष राज्य सेवा आयोग का हो, हमने कहा था कि उसकी दुबारा नियुक्ति नहीं होगी। मैं समझता हूँ कि यह बहुत ही हितकर उपबंध है क्योंकि दुबारा नियुक्ति की कोई आशा बनाये रखना अथवा उसी नियुक्ति को जारी रखना एक प्रकार के प्रलोभन की भांति कार्य करेगी जो सदस्य को पक्षपात रहित कार्य नहीं करने देगी जिसकी आशा उसके कर्त्तव्य निभाने से की जाती है। इसलिए यह मूलभूत रुकावट है जो प्रारूप अनुच्छेद में रखी गई है।
दूसरी चीज यह है कि अनुच्छेद 285ग के अनुसार यहाँ भी एक उपबंध है कि