126 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
ये किसी दूसरे पद की नियुक्ति के लिए योग्य नहीं होंगे। इसलिए यहाँ दोहरी निर्योग्यता है। उनको अपने पद पर चलते रहने की भी इजाजत नहीं है और न किसी दूसरे पद पर नियुक्ति का ही उपबंध है। अब केवल अपवादस्वरूप मामले जिनमें ये नियुक्त किये जा सकेंगे वे ये हैं : राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष को संघ लोक सेवा आयोग अथवा दूसरे
राज्य के लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष के पद पर नियुक्ति की आज्ञा है।
दूसरे, संघ आयोग के सदस्य, संघ आयोग अथवा किसी दूसरे राज्य आयोग के
अध्यक्ष बन सकते हैं। तीसरे, राज्य आयोग का सदस्य संघ आयोग का अध्यक्ष अथवा सदस्य अथवा
राज्य आयोग का अध्यक्ष बन सकता है।
दूसरे शब्दों में, अपवाद हैः अर्थात् एक व्यक्ति जो संघ लोक सेवा आयोग का सदस्य है, राज्य लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष, संघ लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष बन सकेगा अथवा संघ लोक सेवा आयोग का सदस्य बन सकेगा। उल्लेखनीय मुख्य बिन्दु यह है कि राज्य आयोग के अध्यक्ष सदस्य उसी राज्य में नौकरी प्राप्त कर सकेंगे। दूसरे राज्य द्वारा उसे अध्यक्ष नियुक्त किया जा सकेगा अथवा केन्द्र सरकार द्वारा लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष अथवा सदस्य नियुक्त किया जा सकेगा। इसका उद्देश्य उसी पद पर कार्य करते रहने में अथवा किसी दूसरे पद पर नियुक्त न करने के विषय में राज्य को किसी प्रकार का संरक्षकत्व प्रयोग में लाने की अनुज्ञा न देना है। ताकि आशा की जाती है कि इन उपबंधों से आयोग के सदस्य स्वतंत्र हो जाएंगे जैसाकि उनके होने की आशा है। मैं नहीं समझता कि यहाँ कोई दूसरा बिंदु है जिसका स्पष्टीकरण अपेक्षित हो।
श्री लक्ष्मी नारायण साहू : संयुक्त आयोग के सदस्यों के बारे में क्या है?
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : संयुक्त आयोग राज्य-आयोग है जो अनुच्छेद 284 के खण्ड (4) में परिभाषित है। श्री मनमोहन दास (पश्चिम बंगाल : सामान्य) : अनुच्छेद 285क के कुछ बिन्दुओं
पर मैं स्पष्टीकरण चाहूँगा। यदि राष्ट्रपति के संदर्भ में, उच्चतम न्यायालय सूचना देता है कि लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष अथवा कोई अन्य सदस्य हटा दिया जाए तब क्या राष्ट्रपति के लिए उसे हटाना कर्त्तव्य होगा? माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : अवश्य।
श्री नजीरूद्दीन अहमद : आपने आदरणीय सदस्य को सदन में नये मसौदे और मूल मसौदे के अंतर पर बयान देने के लिए कहा है। वास्तविक बदलाव के उचित