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गुण ग्रहण के लिए वह सहायक होगा।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : यदि बहस के मध्य कोई बिंदु खड़ा किया
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जाए तो मैं अपने उत्तर में बयान दूंगा।
श्री नजीरुद्दीन अहमद : मैं नहीं जानता कि विरोध करना चाहिए अथवा नहीं करना चाहिए।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : आपने दोनों मसौदों को अवश्य पढ़ लिया
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होगा। केवल एक चीज जिसे आपने नहीं पढ़ा होगा वह छोटे विराम चिह्न और अद्ध र्विराम चिह्न हैं।
माननीय सभापति : अब मैं संशोधनों को लूंगा।
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* माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : सभापति महोदय, यहाँ बहुत थोड़े बिंदु हैं जिन पर मैं एक शब्द अथवा दो शब्द उन अनुच्छेदों की आलोचना के उत्तर में कहना चाहूँगा जिन्हें मैंने सदन के सामने निवेदन किया है।
पहली आलोचना लोक सेवा आयोग के गठन के बारे में है। यहाँ आरक्षण किया गया है कि लोक सेवा आयोग के कम से कम आधे सदस्य अंगरेजी सरकार के नौकर होने चाहिए इस का विरोध इस आधार पर हुआ है कि भारतीय सिविल नौकरी के लिए यह स्वर्ग सिद्ध होगा। मुझे यह कहते हुए अफसोस है कि जिन लोगों ने यह आलोचना की है, वे लोक सेवा आयोग का उद्देश्य, प्रतिष्ठा और कार्य नहीं समझते। लोक सेवा आयोग का कार्य लोक सेवा के लिए योग्य आदमियों का चुनाव करना है। जिसे निर्णय करना है उसके पास निश्चित सीमा तक अनुभव होना निर्णय करने की योग्यता माना जाता है। स्पष्टतः कोई भी व्यक्ति उस व्यक्ति से अच्छा निर्णायक नहीं हो सकता जो अंग्रेजी सरकार की सेवा में पहले ही रह चुका है। इसलिए निश्चित (अनुभव) भाग नौकरी वाले व्यक्तियों के लिए क्यों रखा गया है इसका कारण यह नहीं है कि उन व्यक्तियों पर अहसान करने की कोई इच्छा है जो अंगरेजी सरकार की नौकरी में पहले से ही है। अपितु आवश्यकता है आवश्यक अनुभव के व्यक्तियों को प्राप्त करने की, जो यथासंभव सर्वश्रेष्ठ रीति से अपने कर्त्तव्यों को निभायेंगे। फिर भी मैं संशोधन स्वीकार करने के लिए तैयार हूँ यदि मेरे मित्र श्री कपूर इसके लिए तैयार हैं। मैं यह कहने के लिए तैयार हूँ : “परन्तु कम से कम आधे“ के स्थान
* ख्., सीएडी, खण्ड IX, दिनांक 22 अगस्त, 1949, पृ. 592-93