128 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
पर “परन्तु लगभग आधे के करीब“।
श्री एच.वी. कामथ : क्यों नहीं कहते? ’आधे से अधिक नहीं?’
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : नहीं, मैंने अपना सर्वश्रेष्ठ किया है।
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दूसरे प्रश्न के बारे में कि जो व्यक्ति लोक सेवा आयोग में हैं उन्हें राज्य में अवैतनिक पद ग्रहण करने के लिए अनुज्ञा दी जाए, व्यक्तिगत तौर पर इस सुझाव को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हूँ। हमारा पूर्ण उद्देश्य लोक सेवा आयोग के कार्यपालक अधिकारियों को स्वतंत्र बनाना है। उन्हें कार्यपालिका के स्वतंत्र अधिकारी बनाने का एक मार्ग इन्हें ऐसे पद से वंचित रखना है जिससे कार्यपालिका उन्हें अपने कर्त्तव्यों से विमुख होने का लालच दे। यह बिल्कुल सही है कि वह पद जो लाभ का पद नहीं है, बल्कि अवैतनिक पद होता है, वेतन का नहीं लेकिन जैसा कि हर व्यक्ति जानता है वेतन ही एक चीज नहीं है जो व्यक्ति अपने पद के कारण प्राप्त करता है। यहाँ ऐसी चीज है जैसे, ’वेतन, चुनना और चुराना’। लेकिन यदि ऐसा नहीं है तो भी यहाँ किसी हद तक प्रभाव काम करता है जो पद से व्यक्ति को मिलता है। और मैं सोचता हूँ यह वांछनीय है कि ऐसे व्यक्तियों के पद पर रखने की संभावनाओं से दूर रहा जाए जहाँ भले ही वेतन न ले किन्तु वह कुछ सीमा तक प्रभाव प्राप्त करे।
अब मैं अपने मित्र श्री हृदयनाथ कुंजरू के संशोधन पर आता हूँ। मैं उनसे पूर्णतः सहमत हूँ कि लोक सेवा आयोग की नौकरियों और उच्च न्यायालय, उच्चतम न्यायालय और महालेखा परीक्षक की नौकरियों में एक स्पष्ट अन्तर है। मैं यह स्पष्ट करना चाहूँगा कि क्यों हमने यह अंतर रखा है। उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय के अधिकारियों के बारे में जो सर्वोच्च पदों पर हैं उनसे एक मात्रा में न्यायिक विवेकाधिकार प्रयोग करना अपेक्षित है। परिणामस्वरूप, हमने महसूस किया कि मात्र उनका वेतन व पेंशन ही राष्ट्रपति के अनुमोदन से मुख्य न्यायाधीश द्वारा निश्चित न की जाए अपितु उनकी नौकरी की शर्तें भी मुख्य न्यायाधीश द्वारा निश्चित होनी चाहिएं। लोक सेवा आयोग के बारे में अधिक कर्मचारीवृन्द वास्तव में संपूर्ण कर्मचारीवृंद - मात्र उससे संबंधित होंगे जिसे हम ’अनुसचिवीय कर्त्तव्य’ कहते हैं जहाँ न तो कोई प्राधिकार है और न ही विवेकाधिकार बचा है। यही कारण है कि हमने यह अंतर किया है। लेकिन मैं देखता हूँ कदाचित मेरा तर्क इतना ठोस नहीं है जितना दिखाई देता है। अंत में मैं अपने आदरणीय मित्र श्री कुंजरू को सुझाव है कि वह इस अनुच्छेद को इस वायदे पर पारित होने दें कि बाद के प्रक्रम पर यदि मुझे ज्ञात होता है कि बदलाव करने की आवश्यकता है, तो मैं सदन के सम्मुख आवश्यक संशोधन लेकर आऊंगा।