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खण्ड के लिए यह अधिक उपयुक्त है जहाँ अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लोगों की परिभाषा होगी। यदि मेरे मित्र इस संशोधन को रखना चाहते हैं, तो उन्हें उस समय तक हिम्मत से खड़ा रहना होगा जब तक कि संविधान के उस भाग- अनुच्छेद 303 पर हम आते हैं।
माननीय सभापति : क्या आपने डा. अम्बेडकर को समझा है?
माननीय जे. जे. एम. निकोल्स (असम - साधारण) : हाँ, समझा है, मेरा संशोधन उस संशोधन पर आधारित था जो श्री ठक्कर द्वारा संख्या 3108 पेश किया जाना था। और मैं अब देखता हूँ कि संशोधन संख्या (28) जिसे वे अब पेश करने जा रहे हैं, दूसरी स्थिति में है। तो भी, यदि श्री ठक्कर उस संशोधन को पेश नहीं कर रहे, तो मैं भी अब अपना संशोधन पेश नहीं करूंगा। लेकिन मैं अपना अधिकार सुरक्षित रखता हूँ कि मैं अपना संशोधन उस समय पेश करूंगा जब उस विषयक अनुच्छेद 303 पर विचार होगा।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : मैं भी सुझाव देता हूँ कि जो संशोधन श्री ठक्कर के नाम पर है, वह रहना चाहिए और उसे उस समय ही लिया जाए जब हम अनुच्छेद 303 पर चर्चा करें।
मैं सहमत होऊंगा।
श्री ए. वी. ठक्कर (सौराष्ट्र) : मैं पूरी तरह सहमत हूँ। सरदार भूपिन्दर सिंह मान (पूर्वी पंजाब-सिख) : बहुत से संशोधन पेश किए
जा चुके हैं, मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि उनका विरोध करने के लिए कुछ समय मिलेगा।
माननीय सभापति : जैसा मैंने कहा -इसी प्रतिपादन पर इसी सदन में पूरे दो दिन हम बहस कर चुके हैं और सदन के प्रत्येक वर्ग को अपने आप को सामान्य सिद्धांतों की व्याख्या करने का अवसर मिला है। ये वही सिद्धांत हैं जो अब प्रस्ताव में रखे जाने वाले हैं जो डॉ. अम्बेडकर के द्वारा सदन के समक्ष रखे जाने वाले हैं। मैं नहीं समझता कि अब और बहस सदस्यों को लाभकारी रहेगी। इसलिए बोलने के लिए मैं डॉ. अम्बेडकर को बुलाता हूँ।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : अध्यक्ष महोदय, इस अनुच्छेद की बहस के
* ख्., सीएडी, खण्ड IX, दिनांक 24 अगस्त, 1949, पृ. 643-644
** ख्., सीएडी, खण्ड IX, दिनांक 24 अगस्त, 1949, पृ. 657-658