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अब मैं सरदार हुक्म सिंह द्वारा लाये गये संशोधन पर आता हूँ जिसमें सुझाव दिया गया है कि ऐसा उपबन्ध किया जायँ जिससे अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जन-जातियां उन सीटों पर चुनाव लड़ सकें जो सामान्यतः अनुसूचित जातियों अथवा अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित नहीं हैं। उन्होंने कहा कि प्रारूपण समिति ने जानबूझ कर इसे छोड़ा है। मैं नहीं सोचता कि वह सही हैं। यह स्वीकार किया गया है कि अनुसूचित जातियां और अनुसूचित जनजातियों को उन सीटों पर चुनाव लड़ने का अधिकार होगा जो आरक्षित सीटें नहीं हैं अर्थात् अनारक्षित सीटें हैं। यह सलाहकार समिति की रिपोर्ट है जो सदन द्वारा पहले ही स्वीकार की जा चुकी है। वह कारण कि क्यों वह विशेष उपबन्ध अनुच्छेद 292 में नहीं रखा गया है यह है कि यह इस स्थान पर उपयुक्त नहीं है। इस प्रस्ताव को चुनाव से सम्बन्धित कानून में स्थान मिलेगा जिससे विधानसभा अथवा विधायी हैसियत वाली विधानसभा को विचार करना होगा। इसलिए उन्हें इस आधार पर भयभीत नहीं होना चाहिए।
मेरे मित्र श्री पिल्लई द्वारा उठाये गये बिन्दुओं के बारे में कि जनसंख्या जिसके अनुसार सीट आरक्षित की जाएगी नवीन जनगणना द्वारा प्राक्कलित की जानी चाहिए। मामले पर इस सदन में बहुत से अवसरों पर वाद-विवाद हो चुका है। तब मैंने कहा था कि सरकार के लिए नई जनगणना कराने का वायदा करना असंभव है, लेकिन सरकार ने अपना मस्तिष्क खुला रखा है। यदि यह संभव हुआ तो सरकार अनुसूचित जातियों अथवा अनुसूचित जनजातियों की जनसंख्या प्राक्कलन करने के लिए जिससे कुल प्रतिनिधित्व परिकलित किया जा सके जिसके लिए वे अनुच्छेद 292 के अनुसार हकदार हांगे, नयी जनगणना, करवा सकती है। सरकार यह भी सुझाव दे रही है कि यदि किसी दशा में नई गणना कराना संभव नहीं हुआ तो वह मतदाताओं की संख्या के आधार पर इन जातियों की जनसंख्या का अनुमान लगायेगी, जिसका हिसाब उनसे लगाया जा सकेगा। इस प्रकार हम इस नतीजे पर पहुंचेंगे जिसे हम जनसंख्या का मोटा और तैयार प्राक्कलन कहेंगे। इसके बाहर जाने की बात मैं सोच भी नहीं सकता।
अन्य सभी संशोधनों का मैं विरोध करता हूँ।
[ अनुच्छेद 292 डॉ. अम्बेडकर के प्रस्ताव से संशोधित रूप में संविधान में जोड़ा गया। ]