अनुच्छेद 295-क - Page 161

140 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

प्रतिनिधित्व की समय-सीमा का कोई जिक्र नहीं था। मैं समझता हूँ कि प्रतिवेदन पर बाद की बहस में मेरे मित्र श्री भार्गव द्वारा लाया गया एक संशोधन है। मैं समझता हूँ कि उनका संशोधन सदन द्वारा स्वीकार कर लिया गया था। अतः मैं उनके वर्तमान संशोधन को स्वीकार करने के लिए बाध्य हूँ।

दूसरे, श्री नजीरूद्दीन अहमद द्वारा लाये गये संशोधन के बारे में, मैं समझता हूँ, कि इसका एक भाग मेरे मित्र श्री कृष्णमाचारी के संशोधन से मिलता था जिसे मैं स्वीकार करता हूँ। मैं वर्तमान स्थिति में अपने मस्तिष्क में भी स्वयं बिल्कुल स्पष्ट नहीं हूँ कि क्या खण्ड का अर्थ है कि समय-सीमा संविधान के लागू होते ही आरंभ होगी अथवा नई संसद के प्रथम चुनाव की तारीख से आरंभ होगी। लेकिन मैं जो कुछ इस स्तर पर कह सकता हूँ वह यह है कि यह वह मामला है जिस पर प्रारूपण समिति विचार करेंगी और यदि आवश्यक हुआ तो इरादे को पूर्ण करने के लिए वह संशोधन लायेंगे कि वह अवधि प्रथम संसद की प्रथम बैठक से होनी चाहिए।

मेरे मित्र श्री मुनीस्वामी पिल्लई और श्री मनमोहन दास द्वारा दिए गये तर्कों के बारे में, मुझे दुःख है कि वह संशोधन स्वीकार करना संभव नहीं होगा। उनका प्रस्ताव है कि जब वे खण्ड को यथावत् छोड़ने के लिए तैयार हैं, वह फिरसे दस वर्ष बढ़ाने के लिए संसद को शक्तियाँ प्रदान करने का प्रस्ताव है। जैसा मैंने कहा था, हमने सबसे पहले, इस विषय को संविधान में समाविष्ट किया था और मैं नहीं सोचता कि संविधान के संशोधन के सिवाय, हमें इसमें किसी परिवर्तन की इजाजत देनी चाहिए।

मैं अनुसूचित जातियों के उन सदस्यों की टिप्पणी पर एक दो शब्द कहना चाहूँगा जो किसी हद तक इस अनुच्छेद द्वारा लगाई गई सीमा पर प्रचण्ड और क्रोध में बोले हैं। मुझे कहना है कि उनके पास वास्तव में शिकायत का कोई कारण नहीं था क्योंकि 10 वर्ष की सीमा का फैसला वास्तव में वह फैसला था जो उनकी स्वीकृति से हुआ था। मैं स्वयं अधिक समय का दबाव डालने के लिए तैयार था क्योंकि मैं भी महसूस करता हूँ कि जहाँ तक अनुसूचित जातियों का सम्बन्ध है, उनके साथ वह व्यवहार नहीं होता जो अन्य अल्पसंख्यकां के साथ होता है। उदाहरण के लिए, जहाँ तक मैं जानता हूँ मुसलमानों के लिए विशेष आरक्षण 1892 में आरंभ हो गया था, अर्थात् तब से आरंभ हो गया था। इसलिए, मुसलमानों ने कमोबेश 60 वर्षों तक इन विशेष अधिकारों का व्यवहारिक रूप से उपयोग किया है। ईसाइयों को यह विशेषाधिकार 1920 के संविधान में प्राप्त हो गया था। और उन्होंने इनका उपयोग 28 वर्ष तक किया। अनुसूचित जातियों को यह केवल 1935 के संविधान में मिले। विशेष आरक्षण का व्यवहारिक लाभ वर्ष 1937 में आरंभ हुआ था तब वह अधिनियम