अनुच्छेद 295-क - Page 162

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लागू हुआ। दुर्भाग्य से, उनको इसका लाभ दो वर्ष तक मिला। व्यवहारिक तौर पर 1939 से वर्तमान क्षण तक अथवा 1946 तक, संविधान निलंबित कर दिया गया था पर अनुसूचित जातियां इनके लाभ भोगने की स्थिति में नहीं थी जो उन्हें 1935 के अधिनियम द्वारा दिए गये थे, और मेरे विचार में, संविधान द्वारा अनुसूचित जातियों को लम्बे समय के लिए आरक्षण देना अधिक उचित और उदार होता। लेकिन जैसा मैंने कहा, यह सब सदन के द्वारा स्वीकार किया गया था श्री नागप्पा और मुनीस्वामी पिल्लई तथा इन सभी सदस्यों द्वारा स्वीकार किये गये थे। यदि मैं ऐसा कहूँ, मैं कोई शिकायत नहीं कर रहा हूँ और मैं सोचता हूँ इन उपबन्धों पर दुबारा विचार करना सही नहीं है। यदि 10 वर्ष के अन्त में अनुसूचित जातियां पाएं कि उनकी दशा सुधरी नहीं है अथवा वे समय अवधि को दुबारा बढ़ाना चाहें तो यह उनकी क्षमता के बाहर नहीं होगा अथवा उस आरक्षण को बढ़ाने का नया रास्ता निकालने की चतुराई खोजेंगे जिसका वायदा उनसे यहाँ किया जा रहा है।

श्री. ए. वी. ठक्कर (सौराष्ट्र) : अनुसूचित जनजातियों के बारे में क्या है जो पैमाने पर नीचे हैं।

माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : अनुसूचित जनजातियों के लिए मैं बहुत अधिक समय देने के लिए तैयार हूॅ। लेकिन वे सभी जो अनुसूचित जातियों अथवा अनुसूचित जनजातियों क आरक्षण के बारे में बोले हैं वे ऐसे आग्रही हो गये कि यह बात दस वर्ष में समाप्त होनी चाहिए। मैं उनसे पूरी बात “एडमण्ड बुर्के के शब्दों में, कहना चाहता हूॅ : “बड़े साम्राज्य और छोटे दिमाग एक साथ सही नहीं चलते।“

माननीय सभापति : अब मैं एक के बाद एक संशोधन को रखूंगा।

श्री युधिष्ठर मिश्र (उड़ीसा राज्य) : श्रीमान् मैं अपना संशोधन वापिस लेना चाहूॅगा।

(संशोधन वापस लिया गया)

माननीय सभापति : संशोधन संख्या 40 (सूची I -पाँचवाँ सप्ताह)

श्री एस. नागप्पा : डॉ. अंबेडकर द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण को देखते हुए मैं अपन संषोधन के लिए दबाव नहीं डालूंगा।

(सभा समाप्त हाते ही संशोधन वापिस ले लिया गया)।

सभापति : संशोधन संख्या 99 (सूची II, पाँचवाँ सप्ताह)।

श्री. वी. आई. मुनीस्वामी पिल्लई :- 25 मई को मैं सदन में उपस्थित नहीं था, जब अल्पसंख्यकों की दूसरी समिति के प्रतिवेदन पर विचार किया जा रहा था। तो