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अनुच्छेद 296
* श्री नजीरुद्दीन अहमद - मेरा मुद्दा है कि संशोधन को तकनीकी और सारवान आधारों पर अस्वीकार कर दिया जाए। श्री. टी. टी. कृष्णमाचारी (मद्रास : सामान्य) : श्रीमान्, क्या मैं निवेदन करूँ कि
मेरे माननीय मित्र व्यवस्था के इस प्रश्न को उठाकर पूरी तरह नियम विरुद्ध है क्योंकि यह मामला सदन के द्वारा स्वीकार किया जा चुका है। आदरणीय सदस्य के पास दो पूरे दिन की सूचना है यदि वे दो दिन में संशोधन के महत्व को नहीं समझ पाये हैं तो मुझे विश्वास है कि वे दो माह में भी नहीं समझ सकते।
माननीय सभापति : क्या सुझाव वह है कि स्थानों के आरक्षण के बारे में पिछली बार जब प्रश्न पुनः खोला गया था तब अन्य प्रश्नों में इस एक मुद्दे पर भी विचार हुआ था और तब इस मुद्दे पर भी फैसला ले लिया गया था।
श्री टी. टी. कृष्णमाचारी : मेरा सुझाव है कि यदि मुसलमानों और आंग्ल भारतीयों को अल्पसंख्यक स्वीकार नहीं किया जाता, यह मुद्दा उत्पन्न नहीं होता।
श्री नजीरुद्दीन अहमद : बिल्कुल नहीं। मेरा निवेदन है कि जिसपर विचार हुआ था वह प्रश्न विधानमण्डलों में अल्पसंख्यकों के प्रतिनिधित्व का था। लेकिन इस नये अनुच्छेद का संबंध भिन्न विषय से है - जैसे सचिवालय और जिला इत्यादि में छोटे-छोटे कार्य प्राप्त करने के लिए अल्पसंख्यकों को आरक्षण। विधानमंडल के प्रतिनिधित्व के विषय में सरदार पटेल से परामर्श लिया गया था और हम विधान मंडल में आरक्षण न देने के लिए सहमत थे।
माननीय बी. आर. अम्बेडकर (मुम्बई : सामान्य) : श्रीमान, स्थिति यह है।
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अल्पसंख्यक समिति के प्रतिवेदन में प्रावधान था कि सभी अल्पसंख्यकों को दो सुविधाएं या विशेषाधिकार होने चाहिए जैसे विधानमंडलों में प्रतिनिधित्व और नौकरियों में प्रतिनिधित्व। प्रतिवेदन का पैरा 9 में, जिसे सदन ने स्वीकार कर लिया है, वह हैः
“अखिल भारतीय और प्रान्तीय सेवाओं में अल्पसंख्यकों की मांगें इन नौकरियों में नियुक्तियाँ दक्षता की दृष्टि से प्रशासन में रखी जाएंगी।“
यह मूल प्रतिपादन इस सदन द्वारा पारित कर दी गई थी। बाद में परामर्श समिति दो अल्पसंख्यक मुसलमान व ईसाई की स्वीकृति के नतीजे पर आई - कि इनको अल्पसंख्यक नहीं माना जाना चाहिए। जब सदन ने अब यह स्वीकार कर
* ख्., सीएडी, खण्ड IX, दिनांक 26 अगस्त, 1949, पृ. 702