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वह यह है कि केन्द्र और प्रांतों के बीच अधिकारिता का झगड़ा होगा। यदि वह प्रतिष्टि को इस प्रकार समझते हैं, जैसी मैंने प्रस्तावित की है तो मैं ठीक से नहीं समझता कि वे “अन्वेषण’’ शब्द दो पश्चात्वर्ती संशोधनों में रहने देने की सम्मति किस प्रकार दे सकते हैं जो उन्होंने प्रस्तावित किए हैं अर्थात् सं. 147 और 148। माननीय सभापति : केवल 147।
माननीय डॉ. भीमराव अम्बेडकर : उनके पास दूसरा है।
माननीय सभापति : संशोधन संख्या 148 प्रस्तावित नहीं किया गया है।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : विषय है, “अन्वेषण शब्द“ यहाँ बिल्कुल भी किसी अपराध के “अन्वेषण“ करने की इजाजत नहीं देता है और न देगा क्योंकि दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन मामला पृथक से एक पुलिस अधिकारी पर छोड़ दिया गया है। पुलिस अनन्य रूप से राज्य का विषय है, संघ सूची में इसके लिए कोई स्थान नहीं है। इसलिए “अन्वेषण’’ शब्द का आशय सामान्य जांच से यह पता करना है कि क्या हो रहा है। यह अन्वेषण एक अपराधी पर आरोप-पत्र दाखिल करने की तैयारी नहीं है जो दण्ड प्रक्रिया के अधीन केवल एक पुलिस अधिकारी कर सकता है।
[ “प्रविष्टि 2 डॉ. अम्बेडकर के संशोधन से संशोधित रूप में,संघ सूची में जोड़ी गई। ]
| Col1 | Col2 |
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* माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : श्रीमान मैं प्रस्तावित करने की प्रार्थना करता हूँ।
“कि सूची I की प्रविष्टि 3 के स्थान पर निम्नलिखित प्रविष्टि रखी जाएः-
“3. रक्षा, विदेशी मामले अथवा भारत की सुरक्षा से सम्बन्धित कारणों से भारत-क्षेत्र में निवारण निरोध; वे व्यक्ति जो इस प्रकार के निवारण के अधीन है........“
प्रारूप संविधान में मूल प्रविष्टि से इस प्रविष्टि की तुलना करने पर पता चलेगा कि इसमें केवल दो बदलाव हैंः बाहरी मामले’ शब्द के स्थान पर अब हमने ‘विदेशी मामले’ शब्द प्रयुक्त किया है।“ ‘‘ऐसे निरोध के अधीन व्यक्ति “एक अभिवृद्धि“ है, यह प्रविश्टि 3 में नहीं थी। लेकिन यह पहले ही सदन द्वारा भारत सरकार अधिनियम में पारित किया जा चुका है। इसलिए जो प्रस्ताव मैं कर रहा हूँ इसमें कोई बदलाव नहीं है।
* ख्., सीएडी, खण्ड IX, दिनांक 29 अगस्त, 1949, पृ. 727