प्रविष्टि 22 - Page 183

162 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

किया जाए। उन्होंने कुछ उदाहरण दिए लेकिन वे तथ्य को भूल जाते हैं कि कुछ मामलों में शब्दों का सामान्य प्रयोग पर्याप्त होता है, दूसरे विषयों में यह पर्याप्त नहीं होता है। प्रारूपण समिति ने जानबूझ कर ’जलदस्युता और अपराध’ शब्दों का बहुवचन में प्रयोग किया है क्योंकि उस संदर्भ में जिसमें यह प्रयोग हुआ है यही उचित है।

मेरे मित्र श्री नजीरूद्दीन अहमद ने इस प्रविष्टि के विरुद्ध दूसरे आधार के रूप में कहा कि जलदस्युताओं के पश्चात एक अर्द्धविराम होना चाहिए। अब मैं सोचता हूँ कि वह मद 22, का अर्थ और तात्पर्य बिगाड़ देगा। मान लीजिए हम जलदस्युता के पश्चात् अर्द्धविराम लगा दें तो मद 22 में जलदस्युता शेष प्रविष्टि से पृथक हो जाता है। इसका अर्थ होगा कि केन्द्र को देश की नदियों के अपराधों सहित सभी जलदस्युताओं पर कानून बनाने का अधिकार होगा। इस प्रविष्टि का यह इरादा नहीं है कि केन्द्र को सभी प्रकार की सभी प्रविष्टियों पर कानून बनाने का अधिकार दिया जाए। ’गहरे समुद्र अथवा आकाश में किए गए’ शब्द वे शब्द हैं जो न केवल ’अपराध’ को ही विशेषित करते है : अपितु वे ’जलदस्युता’ शब्द को भी विशेषित करते हैं।

तब, मेरे मित्र का तीसरा आधार था कि हम राष्ट्रों के कानूनों के विरुद्ध अपराध शब्दों के पष्चात ’भूमि पर, खुले समुद्र में और आकाश में’ शब्दों को हटा दें। इससे यह स्पष्ट नहीं होगा कि दूसरी प्रविष्टि ऑल पर्वेसिव है और केंद्रीय विधानमंडल को न केवल खुले समुद्र और आकाश में ही अपितु भूमि पर भी राष्ट्रों के कानूनों के विरुद्ध कार्य करने की प्रविष्टि के प्रथम भाग के विरुद्ध शक्तियां देती हैं। दूसरे शब्दों में, जहाँ तक प्रविष्टि के दूसरे भाग का संबंध है, राज्य के पास किसी प्रकार की शक्ति नहीं होगी। इसलिए मैं निवेदन करता हूँ कि यथाप्रस्तावित प्रविष्टि प्रारूपकार के आशय को प्रेषित करती है और कोई संशोधन आवश्यक नहीं है।

श्री नजीरुद्दीन अहमद : आदरणीय सदस्य ने मुझे नहीं सुना है। राष्ट्रों के कानूनों के विरुद्ध के बारे में क्या है जो न तो खुले समुद्र में हुए हैं, न भूमि पर और न आकाश में लेकिन समुद्र में?

माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : यह उनकी कल्पना में हो सकता है, किसी

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अन्य स्थान पर नहीं?

सरदार हुक्मसिंह (पूर्वी पंजाब : सिख) : यदि यह जलदस्युता शेष मदों से पृथक नहीं है तो क्या ’आकाश में’ शब्द ’जलदस्युता’ शब्द को विशेषित करेंगे।

माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : आकाश में भी जलदस्युता हो सकती है।

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श्री नजीरुद्दीन अहमद : जलदस्युता सदैव जल में होती है। भूमि अथवा आकाश में नहीं।