प्रविष्टि 40 - Page 190

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* माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : श्रीमन, मैंने अपने माननीय मित्रों नजीरुद्दीन

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अहमद तथा डॉ. देशमुख को परस्पर विरुद्ध प्रयोजन से दौड़ते देखता हूँ। एक शब्द ’अकादमी’ शब्द जोड़कर अनुच्छेद की व्याप्त बढ़ाना चाहता है। दूसरा, ’दिल्ली विश्वविद्यालय और संसद द्वारा कानून द्वारा घोषित अन्य संस्थाएं राष्ट्रीय की संस्थाएं’ शब्दों को निकालकर अनुच्छेद की परिधि सीमित करना चाहता है।

जहाँ तक डॉ. देशमुख के संशोधन का संबंध है मुझे ’अकादमी’ शब्द जोड़ना अत्यंत आवश्यक जान पड़ता है क्योंकि ’संस्था’ शब्द इतना व्यापक है कि विश्वविद्यालय और ’अकादमी’ शब्द भी इसके अंतर्गत आ जाते हैं ।

मेरे मित्र श्री नजीरुद्दीन अहमद के संशोधन के बारे में, जैसा उन्होंने इशारा किया, दिल्ली विश्वविद्यालय इस तथ्य के कारण कि दिल्ली विश्वविद्यालय एक आयुक्त के प्रांत में है जो केन्द्र के कानून के अधीन है। इसलिए ’दिल्ली विश्वविद्यालय’ शब्दों को समाविष्ट करते हुए, हम वास्तव में वर्तमान वस्तु-स्थिति से दूर नहीं जा रहे हैं। संसद द्वारा कानून द्वारा घोषित कोई अन्य संस्था से संबंधित प्रविष्टि के पश्चात् के भाग के बारे में, मुझे ऐसा जान पड़ता है कि उन शब्दों को बनाये रखना वांछनीय है। क्योंकि ऐसी संस्थायें होनी चाहिएं जो सांस्कृतिक अथवा राष्ट्रीय दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं और जिसकी वित्तीय स्थिति इतनी सुदृढ़ न हो जितनी किसी अन्य संस्था की और केन्द्र की मदद और सहायता जरूरी हो। उस दृष्टि से, मैं सोचता हूँ प्रविष्टि का अंतिम भाग आवश्यक है और मैं उनके संशोधन को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हूँ।

अब जहाँ तक मेरे मित्र श्री कामथ का संबंध है, वह ’अनुसंधान संस्था’ शब्द समाविष्ट कराना चाहते थे। वह भूल गए हैं अथवा कदाचित उनका ध्यान मेरे संशोधन की ओर संख्या 57क के बारे में आकर्षित नहीं किया गया है जो अनुसंधान संस्था के बारे में है। वास्तव में, वह मानदंडों के समन्वय तक सीमित है। कदाचित श्री कामथ के मस्तिष्क में प्रांतों द्वारा स्थापित अभिकरण और वे जिन्हें केंद्र द्वारा ग्रहण करना वांछनीय है। मुझे लगता है कि केंद्र पर हर प्रकार के संस्थाओं का अधिक भार डालना ठीक नहीं है। यह काफी होगा यदि जैसा मैंने कहा, अनुच्छेद 57-क के उपबंध पारित होने दिए जाएं क्योंकि वह केंद्र को वैज्ञानिक और तकनीकी उच्च शिक्षा संस्थाओं के लिए समन्वय और स्तर बनाए रखने के लिए अधिक शक्तियां देगा। मैं सोचता हूँ कि फिलहाल यह काफी होना चाहिए।

माननीय सभापति : मैं अब संशोधन रखूँगा।

(तीनों संशोधन अस्वीकार किए गए।)

* ख्., सीएडी, खण्ड IX, दिनांक 30 अगस्त, 1949, पृ. 767