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...इसलिए मैं आशा करता हूँ कि मेरे द्वारा प्रस्तावित संशोधन जो यह स्पष्ट करता है कि ’संपत्ति अर्जन अथवा अधिग्रहण संसद द्वारा पारित कानून से होगा और स्वच्छन्द रूप से स्वीकार नहीं हो जाएगा।
आदरणीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : यह बिल्कुल आवश्यक है। यह प्रविष्टि विधायी शक्तियों के बारे में है। ’संघ के कानूनों के अनुसार’ शब्द जोड़ने का क्या महत्व है? जैसी यह प्रविष्टि है के उसके अनुसार, संघ को कानून बनाने की शक्तियाँ प्राप्त होंगी। इसके अतिरिक्त, कोई अर्थ नहीं हो सकता।
डॉ. पी.एस. देशमुख : मैं अपना संशोधन वापिस लेने की अनुमति चाहता हूँ।
(सभा की अनुमति से संशोधन वापिस लिया गया। प्रविष्टि 43 डॉ. अम्बेडकर के संशोधन से संशोधित रूप में संघ सूची में जोड़ी गई।)
प्रविष्टि 50
* श्री जगत नारायण लाल : यह अर्थ को बिल्कुल स्पष्ट करेगा। यहाँ कोई भी अनिश्चित अवस्था नहीं होगी। यह सुझाव में श्री टी.टी. कृष्णमाचारी को देता है। उनके विचार में जो उद्देश्य है मेरा सुझाव मान लेने पर प्राप्त हो जाएगा।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : मैं इस विषय पर विचार करूँगा। फिलहाल श्री टी.टी. कृष्णमाचारी द्वारा प्रस्तावित प्रविष्टि मान ली जाए।
(श्री कृष्णमाचारी का निम्नलिखित संशोधन स्वीकार कर लिया गया।) माननीय सभापति : प्रश्न हैः
“कि सूची I का प्रविष्टि 50 के स्थान पर निम्नलिखित प्रविष्टि रखी जाए :
- बैंकिंग, बीमा और वित्तीय निगमों सहित व्यापार निगमों का निगमन, नियमन और परिसमापन लेकिन सहकारी सोसाइटियां इसके अंतर्गत नहीं हैं।
50क. व्यापारगत या भिन्न निगमों का निगमन विनियमन और परिसमापन जिसके उद्देश्य एक राज्य तक सीमित न हां लेकिन विश्वविद्यालय इसके अंतर्गत नहीं।“
(प्रविष्टि 50 और 50क संघ सूची में जोड़ी गई।)
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* ख्., सीएडी, खण्ड IX, दिनांक 30 अगस्त, 1949, पृ. 773-74