प्रविष्टि 52 - Page 195

174 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

प्रविष्टि 52

माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : मेरा प्रस्ताव है :

“कि सूची I की प्रविष्टि 52 के स्थान पर निम्नलिखित प्रविष्टि रखी जाए :

’52. उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के गठन और संगठन उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता और शक्तियाँ और वहाँ ली जा रही फीस उच्चतम न्यायालय या किसी उच्च न्यायालय के समक्ष वकालत करने के हकदार व्यक्ति......“

अंतिम शब्द जोड़े गए हैं। उनको जोड़ना आवश्यक जान पड़ा था क्योंकि वह समय आ गया है जब दोनों उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय में वकालत करने वाले व्यक्तियों के अधिकार को विनियमित करना आवश्यक है।

** माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : मैं बहस में हस्तक्षेप करना नहीं चाहता? लेकिन मैं संकेत करना चाहूँगा कि हमने अनुच्छेद 192क, 193, 197 और 207 पहले ही पारित कर दिए हैं जो उच्च न्यायालय के गठन के बारे में है। उन अनुच्छेदों के अधीन धन संबंधी अधिकारिता के अतिरिक्त सभी उच्च न्यायालय रखे गए हैं जहाँ तक उनके गठन, संगठन और केंद्र में क्षेत्रीय अधिकारिता का संबंध है। अतः मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि यह संशोधन ठीक नहीं है।

*** श्री नजीरुद्दीन अहमद : मूल प्रविष्टि केवल उच्चतम न्यायालय के बारे में है। डॉ. अम्बेडकर द्वारा प्रस्तावित नई प्रविष्टि इस प्रकार है ’उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों का गठन और संगठन’। तब उन्होंने दुबारा जोड़ा है ’उच्चतम न्यायालय अथवा उच्च न्यायालयों में वकालत करने के हकदान व्यक्ति’।

मेरा पहला एतराज चोरी-छिपे किए जाने के ढंग के बारे में है जिसमें महत्वपूर्ण चीजें प्रविष्टि में छल कपट से भरी गई हैं। मैं भली-भांति समझ सकता था .....

(व्यवधान)

श्री महावीर त्यागी : व्यवस्था के बिंदु पर, श्रीमन, ’चोरीछिपे’ शब्द संसदीय हैं?

**** माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : क्या यह उचित बहस है श्रीमन। यह कहने के लिए कि प्रारूपण समिति ने छल-कपट से कुछ समाविष्ट करने का प्रयत्न किया। मेरे आदरणीय मित्र मुझसे स्पष्टीकरण के हकदार हैं कि मैंने प्रविष्टि को क्यों

* ख्., सीएडी, खण्ड IX, दिनांक 30 अगस्त, 1949, पृ. 773-74

** ख्., सीएडी, खण्ड IX, दिनांक 30 अगस्त, 1949, पृ. 775

*** वही, पृ. 778

**** वही, पृ. 778