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बदल दिया? यहाँ कोई छल-कपट नहीं है। मैं प्रत्येक अनुच्छेद और उसके भाग को पूर्णतः उचित ठहराने के लिए तैयार हूँ।
श्री महावीर त्यागी : श्रीमन, मैं आपका फैसला चाहता हूँ। क्या ’छल-कपट’ शब्द संसदीय हैं?
माननीय सभापति : मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं इस हद तक संसदीय अभ्यास से परिचति नहीं हूँ कि ’छल-कपट’ संसदीय अथवा असंसदीय हैं। मैं आदरणीय सदस्य से कहना चाहूँगा कि ऐसा बयान न दें जो आक्रामक हो।
श्री नजीरुद्दीन अहमद : श्रीमन, मैं आपके फैसले के सामने सर झुकाता हूँ।
श्री टी.टी. कृष्णमाचारी : डॉ. अम्बेडकर द्वारा सदन के सदस्यों का ध्यान पहले ही अनुच्छेद 207 की ओर आकर्षित किया जा चुका है। श्रीमन, क्या मैं कह सकता हूँ कि उसके संदर्भ में आदरणीय सदस्यों को इस बिंदु पर मेहनत करने की आवश्यकता नहीं थी।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : मैं उत्तर दे सकता हूँ। मैं केवल 10 मिनट चाहता हूँ। मैंने समझ लिया है कि वे क्या कहना चाहते हैं?
श्री नजीरुद्दीन अहमद : यहाँ उत्तर देने का एक वायदा है लेकिन डॉ. अम्बेडकर से उत्तर पाना मेरे लिए असामान्य भाग्य की बात होगी...। आसान तरीके से व्यवहार करने के लिए यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण मामला है। मैं निवेदन करता हूँ कि यदि हम मान लें कि प्रारूपण समिति जो कुछ पसन्द करे वह करने के लिए हकदार है तब वास्तव में मैं पूर्णतः अदालत के बाहर हूँ। मैं महसूस करता हूँ कि मैंने कारण के बावजूद भी कुछ हार झेली हैं।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : श्रीमन, मैं यह कहते हुए आरंभ करने के लिए बाध्य हूँ कि मैंने अनेक अवसरों पर महसूस किया है कि मेरे मित्र श्री नजीरुद्दीन अहमद को प्रारूपण समिति के लिए बहुत ही उपहासजनक शब्दों में बात करने की आदत है। मैं उनको उत्तर देने के लिए उनके स्तर तक नहीं गिर सकता। लेकिन मैं उनको एक चेतावनी देना चाहूँगा कि यदि वह इस प्रकार की बात करने की हठ करेंगे तो मैं निश्चय ही उन्हीं शब्दों में उत्तर देने में असफल नहीं होऊंगा।
श्री नजीरुद्दीन अहमद : क्या सदस्यों को इस ढंग से धमकाया जाएगा? मेरे ऊपर निःसंदेह (इसका) कोई प्रभाव नहीं है।
माननीय डॉ. बी. आर. अम्बेडकर : यह धमकी नहीं है। यह चेतावनी है।
अब मैं अपने मित्र पंजाबराव देशमुख द्वारा उठाए बिंदुओं पर आ रहा हूँ। मुझे